जला पसीना ईंट पकाया,
छेनी से भगवान बनाया।
मन्दिर मस्जिद बन जाने पर,
जो अंदर भी ना जा पाया।
किसके छूने पर भगवन को,
बहुत छूत का रिस्क है।
कौन दलाली से उनकी,
जेब भरेगा फिक्स है।
बहा पसीना अन्न उगाया
भले कभी भरपेट न खाया
और मंडियों में जब पहुंचा,
सही दाम जो कभी न प…