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मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

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मनोज जानी॰ काम

मनोज जानी ड़ाट काम पर  आपका स्वागत है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज में घट रही घटनाएँ उसे कुछ ना कुछ सोचने को विवश करती रहती हैं। हर मुद्दे पर सभी अपनी राय अलग अलग तरह से ब्यक्त करते हैं। कोई भाषण देता है, कोई कविता या गजल कहता है, कोई ब्यंग्य या कालम लिखता है। यह वेबसाइट भी अपने विचार ब्यक्त करने और आप लोगों से संवाद का एक माध्यम है। लेकिन बिना आपकी राय के यह संवाद पूरा नहीं होगा। अत: आप अपने विचार अवश्य लिखें। 

लेटेस्ट पोस्ट

आया देख रफाल .......(व्यंग्य, सामयिक कविता)

थरथर कांपे पाक अब, चीन और नेपाल ।
गर्व करो, नारे गढ़ो, आया देख रफाल ।।

रोजगार भी छिन रहा, क्राइम से बेहाल।
शिक्षा मिले न स्वास्थ्य ही, छोड़…

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निर्भरता में आत्मनिर्भर ... (व्यंग्य)

मानव जब से इस पृथ्वी पर अवतरित होता है, तब से लेकर मरने तक बस आत्मनिर्भर बनने की कोशिश में लगा रहता है। क्योंकि पुरखों की जमात हमेशा से, आने वाली पीढ़ी को आत्मनिर्भर बनने के मंत्र देती रही है। उसे अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए उकसाती रही है। लेकिन मनुष्य बचपन में माँ-बाप पर निर्भर रहता है, तो जवानी म…

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विकास हो रहा है..... (व्यंग्य)

हमारा देश विकास के आकाश में, गोते लगा रहा है। हर तरफ, बस विकास ही विकास नजर आ रहा है। अगर देश का विकास नहीं दिख रहा, तो नजर का विकास करिए, या फिर पाकिस्तान जाने का प्रयास करिए। आज विकास का वो जलवा है कि, अगर पुलिस, विकास को पकड़ने जाती है, तो पुलिस का एनकाउंटर हो जाता है। और अगर विकास, पुलिस की पकड़ म…

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चना की अर्चना (व्यंग्य)

भक्त : ऋषिवर ये अचानक चाइना चाइना से चना चना कैसे होने लगा? गेंहू-चावल के साथ चना बांटने की सूचना देने के लिए प्रभू को टीवी पर क्यों अवतरित होना पड़ा? ये प्रभु ने जनता को चने बांटने का वादा क्यों किया है ऋषिवर? इस चने का क्या महात्म्य है?…

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इन सम कोउ ज्ञानी जग नाहीं !! (व्यंग्य)

यूँ तो हम भारतवासी, सदियों से विश्वगुरु रहे हैं, लेकिन हाल के वर्षों में हमारी विशेषज्ञता में चार चाँद लग गए है। अब तो हाल ये है कि हमें हर महीने, कभी-कभी तो हर हफ्ते, विशेषज्ञता के दौरे पड़ने लगे हैं। हालत यह हो गई है कि जब तक दो चार लोगों पर ज्ञान की बौछार न कर ली जाये, पेट साफ ही नहीं होता। हमारे …

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जनता की आह यूँ ही, बेकार नहीं होती ....

जनता की आह यूँ ही, बेकार नहीं होती ।
केवल फतह, फरेब से, हर बार नहीं होती।


खुद पे हो भरोसा और, जज्बा बुलंद हो,
उसको किसी मदद की, दरकार न…

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लोग मरते रहे ....

लोग मरते रहे, छटपटाते रहे।
अपने-अपने मसीहा, बुलाते रहे।

वक्त ही ना मिला, उन मसीहाओं को,
और दरिंदे तो, लाशें बिछाते रहे।…

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हम आदमी ही आदमी का, मांस खा रहे हैं।

एक दूसरे को हिंदू,  मुस्लिम  जला  रहे  हैं।
हम आदमी ही आदमी का, मांस खा रहे हैं।

है कौन बड़ा दोषी, और  कौन  मसीहा  है?
जब मिल…

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मन के मत पे मत करियो..... (व्यंग्य)

कलियुगी बाबा लोग प्रवचन ठेलते हैं कि मन बावरा है। सारे सांसारिक गलत कामों के लिए मन ही उकसाता है। बुजुर्ग लोग हर चीज में नकारात्मक सलाह देते हैं। ये मत करो। वो मत करो। यहाँ मत जाओ। वहाँ मत जाओ। मनमानी मत करो। इस महान भारतभूमि पर एसे बहुत से खलिहर महानुभाव वास करते हैं, जो आपको ‘मन’ और ‘मत’ पर घंटो प…

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मन के मत पे मत करियो..... (व्यंग्य)

कलियुगी बाबा लोग प्रवचन ठेलते हैं कि मन बावरा है। सारे सांसारिक गलत कामों के लिए मन ही उकसाता है। बुजुर्ग लोग हर चीज में नकारात्मक सलाह देते हैं। ये मत करो। वो मत करो। यहाँ मत जाओ। वहाँ मत जाओ। मनमानी मत करो। इस महान भारतभूमि पर एसे बहुत से खलिहर महानुभाव वास करते हैं, जो आपको ‘मन’ और ‘मत’ पर घंटो प…

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आईने के सामने (काव्य संग्रह) का विमोचन 2014

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चिकोटी (ब्यंग्य संग्रह) का विमोचन 2012

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अन्यत्र

आदरणीय  कुशवाहा जी प्रणाम। कमेन्ट के लिए धन्यवाद ।
मनोज जी, अत्यंत सुंदर व्यंग्य रचना। शायद सत्ताधारियों के लिए भी जनता अब केवल हंसी-मजाक विषय रह गई है. जब चाहो उसका मजाक उड़ाओ और उसी के नाम पर खाओ&...
कुछ न कुछ तो कहना ही पड़ेगा , जानी साहब. कब तक बहरे बन कर बैठे रहेंगे. कब तक अपने जज्बातों को मरते हुए देखेंगे. आखिर कब तक. देश के हालात को व्यक्त क...
स्नेही जानी जी , सादर ,बहुत सुन्दर भाव से पूर्ण कविता ,आज की सच्चाई को निरुपित करती हुई . सफल प्रस्तुति हेतु बधाई .
तरस रहे हैं जो खुद, मय के एक कतरे को, एसे शाकी हमें, आखिर शराब क्या देंगे? श्री मनोज कुमार जी , नमस्कार ! क्या बात है ! आपने आदरणीय डॉ . बाली से...

आपकी राय

आप बहुत अच्छा लिखते है आप के व्यंग काबेले तारीफ़ है

बहुत खूब मनोज। बेहतरीन लेख और शानदार व्यंग्य शैली। सच्चाई को लिखने का यह अंदाज काबिले तारीफ़ है। इसे जारी रखिए।

गजब लिखते हो मनोज जी मजा आ गया पढ़कर

सोचने का तरीका बदल दिया या फिर मैं पहले सोच ही नहीं रहा था ।
आंखे खुली होने के बावजूद दिख वहीं रहा था जो सुन रहा था ।
बहुत शानदार....

क्या व्यंग लिखा है सर पढ़कर मजा ही आ गया।

ये लाइन दिल को छू गया।। जबरदस्त observation

बहुत सुन्दर कवि जी. जहाँ न पहुंचे रवि, वहाँ पहुंचे कवि मनोज.

बहुत अच्छा सर। शब्द का सही अर्थ समझाया है आपने.

जो जितना लोगो पर निर्भर है वही आत्मनिर्भर कहलाता है।।।
Great सर
बधाई शानदार व्यंग्य

यथार्थ व्यंग्य सटीक

Jabardast byang kiya he bade bhai...

सच में रिषिवर आपकी जय हो।व्यंग्य काविले तारीफ है। ।

राजनीतिक परिदृश्य में एक सुंदर व्यंगात्मक लेख ।
आपको प्रणाम

Very nice manoj ji

आज तो अकेला चना , अपने बाजे घना रूप से भाड़ फोड़ने में लगा है।।
बहुत बढ़िया सर