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मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

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मनोज जानी॰ काम

मनोज जानी ड़ाट काम पर  आपका स्वागत है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज में घट रही घटनाएँ उसे कुछ ना कुछ सोचने को विवश करती रहती हैं। हर मुद्दे पर सभी अपनी राय अलग अलग तरह से ब्यक्त करते हैं। कोई भाषण देता है, कोई कविता या गजल कहता है, कोई ब्यंग्य या कालम लिखता है। यह वेबसाइट भी अपने विचार ब्यक्त करने और आप लोगों से संवाद का एक माध्यम है। लेकिन बिना आपकी राय के यह संवाद पूरा नहीं होगा। अत: आप अपने विचार अवश्य लिखें। 

लेटेस्ट पोस्ट

बढ़िया है... भई...बढ़िया है...

बढ़िया है... भई...बढ़िया है...

तेरे नेता देश लूटते, देश भक्त बस मेरे नेता,
सबके अपने चश्मे हैं, सबका अलग नजरिया है। 
बढ़िया है...भई... …

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डरना जरूरी है...... !!! (व्यंग्य)

             जिस तरह देश की रक्षा में, मरना जरूरी है। काम करो या ना करो, काम का दिखावा करना जरूरी है। अच्छे दिन लाने के लिए, अपनी जेबें भरना जरूरी है। ईमानदार होने के लिए, भ्रष्टाचार करना जरूरी है। ठीक वैसे ही देश के विकास के लिए, जनता-मीडिया-संस्थानो का, सरकार से डरना जरूरी है। हमारे देश की जनता, व…

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तुम पब्लिक हो, इंतजार करो...

तुम पब्लिक हो, इंतजार करो...

हम रामराज्य ले आएँगे, हमपे केवल एतबार करो

तुम पब्लिक हो, इंतजार करो.....

 

तुम भोली- भाली जनता हो, भारत में तुम्…

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समस्या हैप्पी न्यू ईयर की .... (ब्यंग)

जब-जब नया साल आता है, मेरे दिल की धड़कन बढ़ती जाती है। बात ही इतनी खतरनाक है। हैपी न्यू ईयर आता है और जेब को तरह-तरह से सैड कर जाता है। वैसे नया साल हो या साली, जेब पर दोनों ही भारी पड़ते हैं। नया साल केवल जेब ही नही काटता, बल्कि ढेर सारी परेशानियाँ भी बांटता है।…

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. . . हैप्पी न्यू ईयर !! 2018

देश की मंहगाई से बेहाल देशवासियो को नये साल की बधाई। नये वेतन आयोग से खुशहाल सरकारी बाबुओं को हैप्पी न्यू  ईयर। आजकल सभी लोग न्यू ईयर के हैप्पी होने की कामना कर रहे हैं। पुराने साल में हैप्पी न्यू ईयर के बाद तो सब सैड सैड ही रहा। कभी  तेल के दाम ने बदहजमी की,  तो कभी गैस (के दामों) ने पेट खराब किया।…

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करेक्टर वाली गाय.......

गरीबी से परेशान,

था एक किसान।

न पैसे, न बेंचने को,

था कोई सामान।

दो गायें थी उसकी,

कुल जमा पूंजी।

इनके सिवा संपत्ति,…

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समस्या, एक ‘राष्ट्रीय समस्या’ की ! (व्यंग्य)

एकाएक हमारा राष्ट्र जैसे बिलकुल अनाथ सा हो गया है। ना कोई माँ, ना बाप, ना भाई, ना बहन। ना कोई खुशी, ना गम। ना कोई काम, ना आराम। हिंदुओं- मुसलमानों- सिक्खों- ईसाइयों की भीड़ में बिलकुल अकेला। ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों से खचाखच भरे होने के बाद भी एक-एक भारतीय के लिए तरसता, बिल्कुल तनहा…

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टेक्निकल लोचा....... (व्यंग्य)

हमारे देश में तरह तरह के लोचे होते रहते हैं। कभी केमिकल लोचा हो जाता है तो कभी टेक्निकल लोचा। राजनीतिक और धार्मिक लोचे तो आए दिन होते ही रहते हैं। वैसे लोचा करने को लुच्चई कहते हैं कि नहीं ये नहीं पता। लेकिन इतना जरूर पता है कि लोचा और लुच्चई एक दूसरे के सगे-सम्बन्धी जरूर हैं और दोनों हमारे देश में …

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हर कीमत पर जो बिकने को...

हर कीमत पर जो बिकने को, बैठे हैं बाजारों में।  

भ्रस्टाचार वो ढूंढ रहे हैं, औरों के किरदारों में। 

 

जिनको  हम समझे…

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कहना तो, हर बार मान लेते हैं....

हम उनका कहना तो, हर बार मान लेते हैं.

जो झूठे वादों से, हम सबकी जान लेते हैं.

               

कहा था जनता के, खाते में पैसे आयेंगे,…

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आईने के सामने (काव्य संग्रह) का विमोचन 2014

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चिकोटी (ब्यंग्य संग्रह) का विमोचन 2012

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अन्यत्र

आदरणीय  कुशवाहा जी प्रणाम। कमेन्ट के लिए धन्यवाद ।
मनोज जी, अत्यंत सुंदर व्यंग्य रचना। शायद सत्ताधारियों के लिए भी जनता अब केवल हंसी-मजाक विषय रह गई है. जब चाहो उसका मजाक उड़ाओ और उसी के नाम पर खाओ&...
कुछ न कुछ तो कहना ही पड़ेगा , जानी साहब. कब तक बहरे बन कर बैठे रहेंगे. कब तक अपने जज्बातों को मरते हुए देखेंगे. आखिर कब तक. देश के हालात को व्यक्त क...
स्नेही जानी जी , सादर ,बहुत सुन्दर भाव से पूर्ण कविता ,आज की सच्चाई को निरुपित करती हुई . सफल प्रस्तुति हेतु बधाई .
तरस रहे हैं जो खुद, मय के एक कतरे को, एसे शाकी हमें, आखिर शराब क्या देंगे? श्री मनोज कुमार जी , नमस्कार ! क्या बात है ! आपने आदरणीय डॉ . बाली से...

आपकी राय

बहतरीन व्यंग.

जबरदसत व्यन्ग

नक्सलियों का डर दिखाकर, निहत्थे गांव वालों पर गोलियां चलाकर, जंगल-जमीन कॉर्पोरेट की जेब में धीरे से खिसका दिया जाता है। चीन-पाकिस्तान का डर दिखाकर, राफेल का बोफ़ोर्सीकरण हो जाता है। इस तरह अर्थशास्त्र भी डराने की कला में पारंगत होने पर ही आता है। इसीलिए कहता हूं, जब हम खुद डरेंगे और दूसरों को भी डराएंगे। अच्छे दिन, तभी तो आएंगे।जय हो!

बहुत सुन्दर प्रस्तुति है आदरणीय श्री

बहुत सुंदर सार्थक एवं यथार्थ व्यंग्य आज के परिवेश में बिल्कुल फिट है।

सबसे बड़ी समस्या तो यही है लोग बिभिन्न मजहबी आड मे समस्या तो पैदा कर देते है पर समाधान कोई नहीं ढूढता

पूर्णतया समयानुकूल।

बर्तमान महौल पर खूबसूरत व्यग्य ।

बढिया..शब्दों के बाण एकदम सटीक मारे हैं सरजी.

बहुत बढ़िया सर।।

बहुत सुंदर कविता (कटाक्ष) है

बहुत खूब आदरणीय । शब्द युद्ध जारी रहना चाहिए ।

Bahut achhi kavita hai.