Menu

मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

header photo

त्रिलोक नाथ तिवाड़ी

फर्ज

December 15, 2013
हिलती जमीन
टूटते घर
सैलाब में
बहते हुए
नगर के नगर । 
लाशों के ढ़ेर
चारों और अंधेर
टीवी वाले 
कुछ भी कहे
ये सब है लेकिन
किस्मत के फेर । 
कभी समन्दर में
घटा था
आज पहाड़ पर 
फटा है
कल को 
हो सकता है
मैदान भी रोये
और कोई 
हमारा भी
अपनों को खोये । 
आज हम 
सकुशल है
तो आओ
किसी की ज़िम्मेदारी
उठाये
दिल खोल कर
मदद करे
और अगर इंसान है
तो 
इंसान होने का 
फर्ज निभाये । 
----त्रिलोक नाथ तिवाड़ी

थोड़ा सा चाँद...

December 15, 2013
कई दिनों की
हाड़ – तोड़
मेहनत के बाद
पृथ्वी सिंह
अपने बेटे की
थाली में
रोटी का
एक
टुकड़ा देख
पाया है ।
चाँद थोड़ा
ही
सही
मगर आज
उसके घर
में
आया है । ।


----त्रिलोक नाथ तिवाड़ी

बेचारा चाँद !!!

December 15, 2013
पूर्णिमा की
पूरी रात
सरोवर के
किनारे
बैठी – बैठी
वो
रूपसी
पानी में
अपनी और
चाँद की
छवि देख,
चाँद को
इस प्रकार
लजाती और
डराती रही
कि
बेचारा चाँद
सुबह
होते ही
मैदान छोड़ के
भाग गया ।

----त्रिलोक नाथ तिवाड़ी

कैसी लगी रचना आपको ? जरूर बताइये ।

There are currently no blog comments.