Menu

मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

header photo

Blog posts : "कविता"

रावण की औलादें हैं जो........

नफरत हिंसा फैला कर जो, देशद्रोह का काम कर रही।
रावण की औलादें हैं जो, राम को बस बदनाम कर रही।

जय श्रीराम बोलकर जब, मुस्लिम की लाश बिछाता है।…

Read more

हे भारत के बहुजन बोलो..............

भेदभाव, अन्याय, उपेक्षा, कब तक यूं ही सहना है?

हे भारत के बहुजन बोलो, कब तक यूं चुप रहना है?

 

बहुजन को दास बनाने हित, ब्राह्मण ने वेद-पुराण रचा।…

Read more

हम भी लूटें, तुम भी लूटो.........

हम भी लूटें, तुम भी लूटो, लूटने की आजादी है।
सबसे ज्यादा वो लूटेगा, जिसके तन पर खादी है।

मंदिर-मस्जिद उलझाओ, लाखों के वादे फेंको,…

Read more

फिर से इलेक्शन आ रहे है।

फिर से.........
इलेक्शन आ रहे हैं।

जिन अछूतों को कभी,
मानव नहीं समझा गया।
कुम्भ में उन भंगियों के, 
पाँव धोये जा रहे हैं। …

Read more

बढ़िया है... भई...बढ़िया है...

बढ़िया है... भई...बढ़िया है...

तेरे नेता देश लूटते, देश भक्त बस मेरे नेता,
सबके अपने चश्मे हैं, सबका अलग नजरिया है। 
बढ़िया है...भई... …

Read more

तुम पब्लिक हो, इंतजार करो...

तुम पब्लिक हो, इंतजार करो...
हम रामराज्य ले आएँगे, हमपे केवल एतबार करो
तुम पब्लिक हो, इंतजार करो.....

तुम भोली- भाली जनता हो, भारत में तुम्हारा खाता …

Read more

करेक्टर वाली गाय.......

गरीबी से परेशान,
था एक किसान।
न पैसे, न बेंचने को,
था कोई सामान।

दो गायें थी उसकी,
कुल जमा पूंजी।
इनके सिवा संपत्ति,

Read more

दर्द होता रहा, छटपटाटे रहे.....

दर्द होता रहा, छटपटाटे रहे, 
भ्रष्ट सिस्टम से हम, चोट खाते रहे.

फूल जन्माष्टमी पर, चढ़ाये बहुत, 
फूल गुलशन के बस, मुरझाते रहे.…

Read more

वो चिंता पे चिंता, किये जा रहे हैं।

वो चिंता पे चिंता, किये जा रहे हैं।
हम उनके भरोसे, जिये जा रहे हैं।

महंगाई पे चिंता, बेगारी पे चिंता,
वो चिंता बराबर, किये जा रहे हैं।…

Read more

वीर सपूत

होली, ईद, दिवाली बस, मनती है जज़्बातों में
हम चैन की नींद तभी सोते हैं, जब जागते हैं वो रातों में।

ठंडी, गर्मी या बारिश हो, जो लड़ते हर हालातों में,…

Read more

यह कैसा है लोकतन्त्र ?

यह कैसा है लोकतन्त्र?
कैसा यह जनता का राज
सहमी-सहमी जनता सारी
कैसा है ये देश आजाद ?

          जनमों के दुश्मन कुर्सी हित…

Read more

बारी -बारी देश को लूटें ..........

बारी -बारी  देश  को  लूटें, बनी रहे  अपनी  जोड़ी।
तू हमरे जीजा के छोड़ा, हम तोहरे जीजा के छोड़ी।

एक सांपनाथ एक नागनाथ, एक अम्बेदकर लोहियावादी,…

Read more

हिन्दी पखवाड़ा .......

हिन्दुस्तान में हिन्दी का, आज हो रहा  यह  सम्मान
हिन्दी पखवाडे के अलावा, हिन्दी कभी ना आये ध्यान

भाषण में हम कहते, ‘हिन्दी, बहुत सुबोध, सरल है’…

Read more

किसे चाहिए वैरागी ? हर दल मांगे, केवल दागी

किसे चाहिए वैरागी ? हर दल मांगे, केवल दागी। 
जिसके पास है पैसा-पावर, जनता उसके पीछे भागी।

जाति-धर्म-धन जनता देखे, और नहीं कुछ जाँचें, …

Read more

बटला काण्ड पर रोईं सोनिया

       बटला पे रोई सोनिया, ये एहसान बहुत है।
      शायद चुनाव क्षेत्र में, मुसलमान बहुत हैं।

              बरसों पुराने जख्म, चुनावों में कुरेदो…

Read more

हालात कुछ एसे बनाए जा रहे हैं ।

हालात कुछ एसे बनाए जा रहे हैं ।
कटघरे में राम लाये जा रहे हैं ।

ईमान जिसमें बाकी है, शूली  पे वो चढ़ेगा
कर्तव्यनिष्ठ या देशभक्त, बेमौत ही भरे…

Read more

बोस-भगत सा वीर चाहिए.......

तम दूर देश का करने को
भेद, बींच का,  हरने  को
देश प्रकाशित,  करने को
मातृ-भूमि हित, मरने को

            धरा समान,  धीर  चाहिए…

Read more

आदमी चाँद पर ----

अम्बर के आंसू सूख गये
तारो ने हंसना बंद किया
पुष्प गंध प्रेमी उधौ  ने
अब तो बारूदी गंध पिया

            कलियों  ने घुंघट तोड दिये…

Read more

धर्म बनाम जाति..............

वतन हिन्द था बहुत सुहावन।  बहत जहा गंगा जल पावन ॥

जाति  धर्म की  चर्चा  नाहीं।  ईर्ष्या, द्वेष ना भारत माहीं ॥

मिलि जुलि रह…

Read more

बीमार को अब जहर, पिला क्यों नहीं देते?

छिपकर  के दुश्मनों से,  कब तक रहोगे घर में
कुछ हम भी हैं  दुनिया को, दिखा क्यो नहीं देते
बीमार को अब जहर,  पिला क्यों नहीं देते?  …

Read more

20 Blog Posts

आपकी राय

पहली बार आपके लेखन को चखा है, आनंद आ गया l लिखते रहो मित्र, जब तक बाती मे तेल है l

भाई रावण कब तक जलाएंगे लाखों खुले आम घूम रहे हैं उनका क्या होगा और कब होगा??

Wha kya baat hain.

एकदम झन्नाटेदार थप्पड़ की तरह रसीद किया है भाई आपने ये जागरूकता चरस भरा व्यंग्यात्मक लेख। उम्मीद है कि hard-core चरसीयों पर भी भारी पड़े आपका ये जागरूक करने वाला चरस।

आप का व्यंग्य बहुत अच्छा है ,एक चुटकी चरस का असर बहुत है।

Jara saa vyngy roopi charas bhii chakh lenaa chahiye .Dil khush ho jaataa hai.bahut khoob kaha......

सटीक व्यंग्य। फ़िल्म में किसी महा पुरूष या स्त्री का किरदार निभाकर क्या वास्तविक जीवन में भी वैसा होने का दावा कर सकता/सकती है। इसके नकारात्मक पहलू को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता । डायन/ चुड़ैल/ वेश्या / चोर/ डकैत/ बलात्कारी का किरदार निभाने वालों के बारे में केवल कल्पना करें तो...

Bahut khub sir

वास्तविकता यही है। सम्मान की भावना नहीं है कहीं भी।

Waw that's so funny but to the point

450;460;dc09453adaf94a231d63b53fb595663f60a40ea6450;460;d0002352e5af17f6e01cfc5b63b0b085d8a9e723450;460;f8dbb37cec00a202ae0f7f571f35ee212e845e39450;460;cb4ea59cca920f73886f27e5f6175cf9099a8659450;460;fe332a72b1b6977a1e793512705a1d337811f0c7450;460;9cbd98aa6de746078e88d5e1f5710e9869c4f0bc450;460;eca37ff7fb507eafa52fb286f59e7d6d6571f0d3450;460;7bdba1a6e54914e7e1367fd58ca4511352dab279450;460;69ba214dba0ee05d3bb3456eb511fab4d459f801450;460;f702a57987d2703f36c19337ab5d4f85ef669a6c450;460;60c0dbc42c3bec9a638f951c8b795ffc0751cdee450;460;1b829655f614f3477e3f1b31d4a0a0aeda9b60a7450;460;946fecccc8f6992688f7ecf7f97ebcd21f308afc450;460;7329d62233309fc3aa69876055d016685139605c450;460;427a1b1844a446301fe570378039629456569db9450;460;0d7f35b92071fc21458352ab08d55de5746531f9450;460;6b3b0d2a9b5fdc3dc08dcf3057128cb798e69dd9

आईने के सामने (काव्य संग्रह) का विमोचन 2014

400;300;bbefc5f3241c3f4c0d7a468c054be9bcc459e09d400;300;40d26eaafe9937571f047278318f3d3abc98cce2400;300;e1f4d813d5b5b2b122c6c08783ca4b8b4a49a1e4400;300;e167fe8aece699e7f9bb586dc0d0cd5a2ab84bd9400;300;b158a94d9e8f801bff569c4a7a1d3b3780508c31400;300;0db3fec3b149a152235839f92ef26bcfdbb196b5400;300;02765181d08ca099f0a189308d9dd3245847f57b400;300;a5615f32ff9790f710137288b2ecfa58bb81b24d400;300;f7d05233306fc9ec810110bfd384a56e64403d8f400;300;aa17d6c24a648a9e67eb529ec2d6ab271861495b400;300;2d1ad46358ec851ac5c13263d45334f2c76923c0400;300;ba0700cddc4b8a14d184453c7732b73120a342c5400;300;b6bcafa52974df5162d990b0e6640717e0790a1e400;300;3c1b21d93f57e01da4b4020cf0c75b0814dcbc6d400;300;f5c091ea51a300c0594499562b18105e6b737f54400;300;321ade6d671a1748ed90a839b2c62a0d5ad08de6400;300;0fcac718c6f87a4300f9be0d65200aa3014f0598400;300;611444ac8359695252891aff0a15880f30674cdc400;300;9180d9868e8d7a988e597dcbea11eec0abb2732c400;300;133bb24e79b4b81eeb95f92bf6503e9b68480b88400;300;76eff75110dd63ce2d071018413764ac842f3c93400;300;dde2b52176792910e721f57b8e591681b8dd101a400;300;f4a4682e1e6fd79a0a4bdc32e1d04159aee78dc9400;300;7a24b22749de7da3bb9e595a1e17db4b356a99cc400;300;6b9380849fddc342a3b6be1fc75c7ea87e70ea9f400;300;dc90fda853774a1078bdf9b9cc5acb3002b00b19400;300;24c4d8558cd94d03734545f87d500c512f329073400;300;7b8b984761538dd807ae811b0c61e7c43c22a972400;300;497979c34e6e587ab99385ca9cf6cc311a53cc6e400;300;52a31b38c18fc9c4867f72e99680cda0d3c90ba1400;300;08d655d00a587a537d54bb0a9e2098d214f26bec400;300;648f666101a94dd4057f6b9c2cc541ed97332522

हमसे संपर्क करें

visitor

606324

चिकोटी (ब्यंग्य संग्रह) का विमोचन 2012

400;300;6600ea27875c26a4e5a17b3943eefb92cabfdfc2400;300;acc334b58ce5ddbe27892e1ea5a56e2e1cf3fd7b400;300;639c67cfe256021f3b8ed1f1ce292980cd5c4dfb400;300;1c995df2006941885bfadf3498bb6672e5c16bbf400;300;f79fd0037dbf643e9418eb6109922fe322768647400;300;d94f122e139211ea9777f323929d9154ad48c8b1400;300;4020022abb2db86100d4eeadf90049249a81a2c0400;300;f9da0526e6526f55f6322b887a05734d74b18e66400;300;9af69a9bc5663ccf5665c289fc1f52ae6c1881f7400;300;e951b2db2cbcafdda64998d2d48d677073c32c28400;300;903118351f39b8f9b420f4e9efdba1cf211f99cf400;300;5c086d13c923ec8206b0950f70ab117fd631768d400;300;71dca355906561389c796eae4e8dd109c6c5df29400;300;b0db18a4f224095594a4d66be34aeaadfca9afb3400;300;dfec8cfba79fdc98dc30515e00493e623ab5ae6e400;300;31f9ea6b78bdf1642617fe95864526994533bbd2400;300;55289cdf9d7779f36c0e87492c4e0747c66f83f0400;300;d2e4b73d6d65367f0b0c76ca40b4bb7d2134c567

अन्यत्र

आदरणीय  कुशवाहा जी प्रणाम। कमेन्ट के लिए धन्यवाद ।
मनोज जी, अत्यंत सुंदर व्यंग्य रचना। शायद सत्ताधारियों के लिए भी जनता अब केवल हंसी-मजाक विषय रह गई है. जब चाहो उसका मजाक उड़ाओ और उसी के नाम पर खाओ&...
कुछ न कुछ तो कहना ही पड़ेगा , जानी साहब. कब तक बहरे बन कर बैठे रहेंगे. कब तक अपने जज्बातों को मरते हुए देखेंगे. आखिर कब तक. देश के हालात को व्यक्त क...
स्नेही जानी जी , सादर ,बहुत सुन्दर भाव से पूर्ण कविता ,आज की सच्चाई को निरुपित करती हुई . सफल प्रस्तुति हेतु बधाई .
तरस रहे हैं जो खुद, मय के एक कतरे को, एसे शाकी हमें, आखिर शराब क्या देंगे? श्री मनोज कुमार जी , नमस्कार ! क्या बात है ! आपने आदरणीय डॉ . बाली से...