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मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

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प्रचार और प्रोपोगंडा, पॉजिटिविटी का फंडा। (व्यंग्य)

       हिन्दी में दो मशहूर कहवाते हैं, पहली, पेट भारी, तो बात भारी। और दूसरी, पेट भारी, तो मात भारी। दोनों कहवातें आजकल सोलह आने सच हो रही हैं। पहली का अर्थ है की अगर पेट भरा हो, खाये अघाए हो तो, बड़ी -बड़ी बातें निकलती हैं। दूसरी कहावत का मतलब है कि ज्यादा खाए-अघाए होने से पेट ख़राब होने से बीमारी पैदा होती है। अगर देश में कुछ भी अच्छा होता है तो सारे खाये-अघाए सरकारात्मक लोग (सकारात्मक न समझें) इसे सरकार का मास्टरस्ट्रोक, दूरदर्शिता, सर्जिकल स्ट्राइक आदि आदि चिल्लाकर, गर्दा उड़ा देते हैं। करोड़ों अरबों रुपयों के विज्ञापन से जनता में जबर्दस्त प्रचार और प्रोपोगंडा करते हैं। और जब देश में कुछ खराब हो जाता है, या सरकार की कोई बड़ी गलती सामने आ जाती है, तो तुरंत ये सरकारात्मक लोग, सबको राजनीति न करने, पाजीटिव सोचने का प्रवचन देने लगते हैं।

      मतलब ये पाजीटिविटी गैंग, चाहे बात नकारात्मक हो या सकारात्मक, हमेशा सरकारात्मक ही रहते हैं। अगर सरकार पाकिस्तान में सर्जिकल स्ट्राइक करे तो आह सरकार, वाह सरकार! दमदार, दूरदर्शी, मजबूत सरकार का चहुं ओर प्रचार और प्रोपोगंडा होगा। और जब चीन हमारी जमीन पर घुसकर हमारे ही सैनिकों को मार दे और कोई सरकार से इसके बारे में सवाल करे तो तुरंत पाजीटिविटी गैंग सक्रिय हो जाता है और सबको प्रवचन देने लगता है कि इस मुद्दे पर राजनीति न करो। उस मुद्दे पर राजनीति न करो। पाजीटिविटी बनाए रखो। सरकारात्मक .... सॉरी, सकारात्मक बनो।

       पॉजिटिविटी गैंग आजकल बहुत सक्रिय हैं इसको देखते हुए आम जनता को पॉजिटिव  बनने की जरूरत है यहां पर भी एक समस्या हैे कि पजिटिव केवल सरकार के लिए होना है, कोरोना के लिए नहीं। कोराना हो या कोई भी बीमारी, महामारी, उनकी रिपोर्ट तो हमेशा  नेगेटिव ही  होनी चाहिए। जनता बेचारी कंफ्यूज है कि कितना  पॉजिटिव होना  है, और कितना  नेगेटिव? अगर पॉजिटिव होते-होते करोना की रिपोर्ट पॉजिटिव हो गई, तब तो सरकार के हाथों मोक्ष मिलना कन्फ़र्म है, और नेगेटिव होते-होते कहीं सरकारी अव्यवस्था की बात कर दी, तो पॉजिटिविटी गैंग आपको नहीं  बक्सेगा। बेचारी जनता इस पॉजिटिविटी और नेगेटिविटी के चक्कर में चक्कर खा रही है। और इस चक्कर में ना तो अपनी परेशानी कह सकती है, ना ही किसी सरकारी अव्यवस्था के बारे में आवाज उठा सकती है।

      जनता की इस परेशानी को देखते हुए पॉजिटिव यानी कि सरकारात्मक बनने के कुछ नुस्खे नीचे दिए जा रहे हैं, इसको मानकर आम नागरिक पूरी तरह पाजीटिव बन सकता है। जैसे कोरोना से या आम बीमारी से बिना इलाज, बिना हॉस्पिटल, बिना डॉक्टर के मरने वाले लोगों  की मृत्यु को, मृत्यु ना कह कर मोक्ष मिलना कहा जाना चाहिए। जब कोई व्यक्ति अपने भगवान के हाथों स्वर्ग भेजा जाता है, तो उसे मोक्ष मिलना कहते हैं। जो लोग नेताओं को, सरकार को अपना भगवान मानते हैं, जब वो बिना इलाज के मृत्यु को प्राप्त होते हैं, तो यह उनके भगवान की इच्छा या  उनके भगवान द्वारा दिया गया मोक्ष है। ऐसी  मौतों को,  मौत ना कह कर मोक्ष मिल गया कहना चाहिए।

      जो लोग सरकार से सवाल करते हैं, सरकार के विरोधी हैं, और सरकार को अपना भगवान नहीं मानते बल्कि अपना  दुश्मन समझते हैं, ऐसे लोग जब बिना दवाई, बिना अस्पताल, बिना आक्सीजन के, बिना डॉक्टर के किसी बीमारी में मारे जाते हैं, तो उनकी मौत को, मौत ना कह कर शहीद होना कहा जाना चाहिए। क्योंकि जो दुश्मनों के हाथों मारे जाते हैं, उन्हें शहीद कहा जाता है। तीसरे वह वर्ग, जो ना सरकार को भगवान मानते हैं और ना ही दुश्मन, बल्कि तटस्थ रहते हैं, जब वह मेडिकल सुविधाओं की कमी से मारे जाते हैं, तो उनकी मौत को मौत नहीं, इतिहास कहा जाना चाहिए, क्योंकि बाबा दिनकर ने पहले ही कह दिया था कि, जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी इतिहास। तो यह समझना चाहिए कि जो तटस्थ हैं, वो मर नहीं रहे हैं, बल्कि वह इतिहास बना रहे हैं।

      इस महामारी में दवाइयां ना मिलने, ऑक्सीजन सिलेंडर ना मिलने  या बहुत  महंगा मिलने को  नेगेटिव तरीके से नहीं देखना चाहिए। बल्कि यह सोचना चाहिए कि दवाइयां बेचने वाले या हॉस्पिटल वालों के अच्छे दिन आ गए हैं। जब वह दवाइयों की कालाबाजारी करके या हॉस्पिटल में छोटी मोटी बीमारियों को भी बड़ी बनाकर कमाई कर रहे हैं तो यह उनके लिए अच्छे दिनों की बात है। इस महामारी के दौर में जब स्कूल भी बिना शिक्षा दिए ही आपसे पूरी फीस वसूल रहे हैं, तो यह भी उनके लिए अच्छे दिन हैं। इसी तरह जब लॉकडाउन में या खराब अर्थव्यवस्था होने के कारण कंपनियां लोगों की नौकरियां कम कर रही हैं या उनको नौकरी से निकाल रही हैं, तो इसको भी पॉजिटिव तरीके से देखना चाहिए कि कंपनियाँ लोगों को निकालकर उन्हें आत्मनिर्भर बनने का मौका दे रही हैं। इस महामारी में भी जब खाने की दाल -तेल के दाम बेतहाशा बढ़ रहे हैं तो इससे अदानी जी के अच्छे दिन तो आ ही रहे हैं। 

      गंगा में मिल रही लाशों को लेकर कुछ देशद्रोही लोग बहुत नेगेटिविटी फैला रहे हैं, जबकि इसे नेगेटिव तरीके से नहीं देखना चाहिए। बल्कि पाजीटिव होकर यह सोचना चाहिए कि गंगा में तैरती लाशों को गंगा मैया में मोक्ष मिल गया है। इस बीमारी में हो रही मौतों  में एक पॉजिटिविटी यह भी देखना चाहिए कि हमारे बहुत से देशभक्त भारतीय, यहां की जनसंख्या से कितने कितना परेशान हैं, उनको हर समस्या का समाधान जनसंख्या का कम होना लगता है। इसलिए ऐसे देशभक्त कितने खुश होंगे की जनसंख्या कम हो रही है। जो लोग देश की हर समस्या की जड़, जनसंख्या को मानते हैं, उनके नजरिए से यह मौतें बहुत पॉजिटिव बात है। 

       पाजीटिव बनने में गणित का नियम बहुत काम आ सकता है। जैसे गणित में निगेटिव को निगेटिव से गुणा करने पर पाजीटिव हो जाता है।  एसे ही जब आपके अन्दर कोई निगेटिव बात आए तो उससे और निगेटिव बात सोचिए, तो आपकी पहले सोची हुई बात पाजीटिव लगने लगेगी। जैसे सरकार को ही देखिये, जब कोरोना की दूसरी लहर में लोग त्राहिमाम त्राहिमाम कर रहे हैं, तो सरकार ने तीसरी लहर और भयानक आने की बात शुरू कर दी। इससे आने वाली बड़ी काल्पनिक समस्या को देखकर, वर्तमान की वास्तविक समस्या से छोटी लगने लगी और उससे राहत लगने लगी। क्योंकि हम तन-मन-धन से और बड़ी समस्या की कल्पना में खो गए। इसे कहते हैं पाजीटिविटी।

      गणित के इसी नियम से आप बड़ी आसानी से एक पाजिटिव और सरकारात्मक आदमी बन सकते हैं। खाँसी बुखार दर्द शुरु हुआ है ? पाजीटिव सोचिए कि आपको टीवी या कैंसर नहीं हुआ। दवाईयॉं बाज़ार से ग़ायब हैं या बहुत महँगी मिल रही हैं ? सकारात्मक रहिये, कि आप लाइन में तो लग गए हैं। जगह जगह ढूंढिए, विधायक-सांसद से गुहार करिये ! इस बेरोजगारी में घर के  हरएक सदस्य को इसी काम पर लगाये रखिये। सकारात्मक बने रहिये कि दो-चार दिन में दवाइयाँ मिल ही जायेंगी । और अगर ना मिली तो भी सकारात्मक रहिए कि आपके पैसे खर्च होने से बच गए। 

     पाजीटिव बने रहिए, सकारात्मक बने रहिये! एडवांस जमा कर दीजिये। लाइन में लगे रहिए। बैड का इंतज़ार करिये, डाक्टर का इंतजार करिए, दवाई का इंतजार करिए। मौत का ...... सॉरी, मोक्ष का इंतजार करिए। बस, सकारात्मक बने रहिए। सकारात्मकता बेहद ज़रूरी है। क्योंकि इसके अलावा आपके पास और कुछ बनने मौका ही नहीं है।

    बाकी अपनों की मौत पर आध्यात्मिक होकर भी पाजीटिव हुआ जा सकता है कि जो आया है एक दिन जाएगा ही। या अध्यात्म में घुसकर ये सोचकर भी पाजीटिव हुआ जा सकता है कि इस मिट्टी से बना शरीर इसी मिट्टी में मिल गया। इस महामारी में जब लोगों की कमाई बंद है, कच्चे तेल का दाम भी घटा है, उस समय भी पेट्रोल डीजल गैस के दाम बढ़ाने को इस नजरिए से देखना चाहिए कि देशभक्त भारतीय, देश के लिए कुर्बानी दे रहे हैं। इस मिट्टी में मिल जांवाँ .... गाकर देशभक्ति में डूब सकते हैं। कुछ देशद्रोही लोग, जो केंद्र सरकार के डेढ़ सौ रुपए के टीके और राज्य सरकारों के तीन सौ रुपयों के टीकों पर टीका-टिप्पणी कर रहे हैं, उनको इस तरह सोचना चाहिए कि राज्य सरकारें अपनी जनता पर ज्यादा पैसा खर्च कर रही हैं, उनको अपनी जनता की सेवा करने का ज्यादा मौका मिला है।

      पाजिटिविटी तो आरएसएस और भाजपा के नेताओं से ही सीखी जा सकती है। अब देखिये, खुद अपनी जान की सुरक्षा के लिए जेडप्लस की सुरक्षा लेकर घूमने वाले मोहन भागवत जी कह रहे हैं कि कोरोना से मर जाना मुक्ति है। भाजपा के नेता टीएस रावत जी कह रहे हैं कि कोरोना वायरस भी एक जीव है, उसे भी जीने का अधिकार है। एक दूसरे मंत्री जी कहते हैं कि पकडे गए कफन चोर हमारे वोटर हैं योगी जी, उन्हें छोड़ दीजिए। आजकल जो लोग महंगाई से परेशान हैं, उन्हें देखना चाहिए कि आजकल जानें कितनी सस्ती हो गई हैं। बाकी प्रचार और प्रोपोगंडा को छोड़ दिया जाए तो पाजीटिविटी का फंडा यही है कि, कोरोना ने इतनी पाजीटिविटी फैलाई है कि अब निगेटिविटी से डर नहीं लगता साहब, पाजीटिविटी से लगता है।

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आपकी राय

Arise, fair sun, and kill the envious moon,

A choking gall, and a preserving sweet.

बहू बढिया लिखा है।भले ही व्यंग्यात्मक शैली में है मगर सच्चाई से दूर नहीं।

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आईने के सामने (काव्य संग्रह) का विमोचन 2014

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चिकोटी (ब्यंग्य संग्रह) का विमोचन 2012

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