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मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

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काला गुरुवार हो गया है

फिर एक बार काला गुरुवार हो गया है।
अब आदमी का जीना दुश्वार हो गया है।

दिल्ली हो या बनारस, जम्मू हो या की पटना
मुंबई हो या कहीं भी, हो सकती है ये घटना

ट्रेनों में हों या कोर्ट में, महफूज नहीं हैं
आतंक के निशाने पे, अब बाजार हो गया है।

फिर एक बार काला गुरुवार हो गया है।

हिन्दू नहीं मरते, न मुसलमान ही मरते हैं
इंसानियत पे वार हो, तो इंसान ही मरते हैं।

नेताओं की चकल्लस, सुन सुन के हुये आजिज़
इंसानियत तो कब से, तार-तार हो गया है।

फिर एक बार काला गुरुवार हो गया है।

हर बार झूठे वादे, हर बार झूठी कसमें
हर बार बस दिलासे, हर बार वही रस्में

घड़ियाली आँसू कब तक, देखेंगे और सहेंगे
लगता है जैसे की अब, सरकार सो गया है

फिर एक बार काला गुरुवार हो गया है।
अब आदमी का जीना दुश्वार हो गया है।

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Comment

आपकी राय

आदरणीय श्री सुप्रभात। ज्वलंत मुद्दों को सालिनता से सबों के समक्ष परोसने में माहिर आपके लेखन और लेखनी को कोटि कोटि नमन है। बहुत ही बढ़िया लेख।

आजकल के हालात पर करारा तमाचा काश सारी जनता समझ सके

बहुत बढ़िया।

क्या किया जाए सर।।
UPSC आप बिना अंग्रेजी पास नही कर सकते, कोर्ट HC and SC की सरकारी भाषा अंग्रेजी है, ट्रैन के ac में बैठकर आप अंग्रेजी न बोलो तो लोग जाहिल समझते है और उससे भी बड़ी बात यदि किसी पर हिंदी में गुस्सा उतार दिए तो गाली देगा अंग्रेजी में उतार दिए तो चुपचाप सुन लेगा , डर जाएगा।।
ऐसी स्थिति में हिंदी का राष्ट्रव्यापी होना मुश्किल है, पर राजभाषा है तो वार्षिक ही सही जश्न मनाना बनता है।।
हिंदी के प्रोत्साहन कार्यक्रम पर आप इनाम की रकम और मिठाई का डब्बा हटा कर देखिये कैसे भाग लेने वाले अधिकारियों कर्मचारियों में कमी आएगी।।
फिर भी मुबारक आपने इस ओर ध्यान दिया।।

चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात वाली कहावत हिंदी पखवाणा के लिए चरितार्थ हो रही है नाम मातृभाषा है उसके प्रचार प्रसार के लिए इतना कुछ करना पडता है । अफसोस??

महान व्यंग्य महान सेवक की पहचान बताने के लिए

बहुत ही बेहतरीन समकालीन व्यंग्य आदरणीय

लाजवाब मनोजजी

Manoj Jani bolta bahi jo he sahi soach ka badsah jani

वाह! साहेब जी, खूबसूरत ग़ज़ल बनाये हैं।

Behtreen andaj!!Ershad!!!

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आईने के सामने (काव्य संग्रह) का विमोचन 2014

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चिकोटी (ब्यंग्य संग्रह) का विमोचन 2012

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मनोज जी, अत्यंत सुंदर व्यंग्य रचना। शायद सत्ताधारियों के लिए भी जनता अब केवल हंसी-मजाक विषय रह गई है. जब चाहो उसका मजाक उड़ाओ और उसी के नाम पर खाओ&...
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