Menu

मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

header photo

कैसी लगी रचना आपको ? जरूर बताइये ।

There are currently no blog comments.

ये कैसी रात है???

May 3, 2013

ये कैसी रात है, दिखता नहीं सवेरा है

जहां-जहां भी नजर जाती है अंधेरा है

 

     जहां थी प्यार की, आबाद अभी तक बस्ती

     वहीं सियासतों  का  आज  लगा ड़ेरा है ।

 

गली के मोड़ पे जिस दम मिले मसीहा थे

उन्ही के सामने तो, कत्ल हुआ  मेरा  है ।

 

     न खुश हो लाश पे, झुकते सियासी लोगों से

     कफ़न से  वोट  बनाने को, सबने  घेरा है ।

 

गमों का जहर लिये दिल में, नाचते हैं हम

नचा  रहा  है  हमें ,वक्त  वो  सपेरा है ।

 

     न हो मगरूंर कली, अपने रूंप और रस में

     चमन में हर तरफ़, भौंरों का ही बसेरा है ।

 

तूं आजकल के भिखारियों से न डर 'जानी '

दिन का दानी ही, यहां रात का लुटेरा है ।

Go Back

Comment