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मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

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क्या कहें साहब !!

July 11, 2012

हम अपने देश के हालात ! क्या कहें साहब !!

दिल में जलते हुये जज़्बात! क्या कहें साहब !!

 

इतने सालों की, जम्हूरियत का, हासिल क्या?

झूठे वादों की है सौगात ! क्या कहें साहब !!

 

इतने सालों में, बस मोहरे सी बनी है जनता,

ये सियासत की है बिसात! क्या कहें साहब !!

 

बच्चियाँ गर्भ में ही मार कर, नौरात्रि मनाएँ,

चढ़ती  दहेज  से बारात ! क्या कहें साहब !!

 

सिमट चुकी है शहर तक ही, तरक्की की चमक,

और गांवों की सियह-रात ! क्या कहें साहब !!

 

भूंख,  महँगाई,  भ्रष्टाचार, हर तरफ फैले,

ये सुलगते से सवालात! क्या कहें साहब !!

 

कहीं तो कर्ज तले, दब के किसान मरते हैं,

कहीं पैसों की है बरसात! क्या कहें साहब !!

 

अब शहीदों के तो, सब घर भी हड़प जाते हैं,

नेता, बाबाओं की औकात! क्या कहें साहब !!

 

 आज भी योग्यता को, जातियों से हम मापें,

सबकी पहचान बनी जात! क्या कहें साहब !!

 

सुनाऊँ चीख किसे, ‘जानी’ सभी बहरों में,

ना करें देश की हम बात! चुप रहें साहब !!

 

हम अपने देश के हालात ! क्या कहें साहब !!

दिल में जलते हुये जज़्बात! क्या कहें साहब !

 

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कुछ न कुछ तो कहना ही पड़ेगा , जानी साहब. कब तक बहरे बन कर बैठे रहेंगे. कब तक अपने जज्बातों को मरते हुए देखेंगे. आखिर कब तक.
देश के हालात को व्यक्त करती हुयी सुन्दर प्रस्तुति.
बधाई.

मनोज जी देश के हालात की बहुत ही सटीक प्रस्तुति की है आपने।
ये हालात बदलना होंगे , हम सबको सामूहिक प्रयास करके।
सराहनीय रचना के लिये बधाई.....



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