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मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

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आँखों में नहीं......

आँखों में नहीं, दिल में, उतर जाएँ कभी तो

दरवाजे खुले हैं, वो इधर आयें, कभी तो ।।

 

मुमकिन नहीं है, मंजिले पाना तो क्या हुआ?

हम-राही में ही, वक्त गुजर जाये, कभी तो।।

 

महंगाई - भ्रष्टाचार में,  जो लोग पिस रहे,

उनकी भी जिन्दगी में, सहर आये कभी तो।।

 

माहौल अपने मुल्क का, अब वो बनाइये,

कि हर गुनाहगार भी, डर जाये कभी तो।।

 

ये सोच के, हर बार उन्हें, वोट किया है,

ये शख्स-सियासी भी, सुधर जाएँ कभी तो।।  

 

ईमान बदलकर, जो दिए दूसरों को दर्द,

एकबार वो भी चाक-जिगर, पायें कभी तो।

 

जीने की ख्वाहिशें भी,  होती  जरुर  हैं,

मिलते ही उनसे आँख जो, मर जाएँ कभी तो।

 

दिल की बुझेगी प्यास, औ छाएगी घटा भी,

जुल्फों को अपनी खोलके, लहराएँ कभी तो।

 

एक बार  ही  निगाह, वो  हमपर भी डाल दें,

किस्मत भी अपनी ‘जानी’, संवर जाये कभी तो। 

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Wah wah .... ... kya baat hai... lll



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आईने के सामने (काव्य संग्रह) का विमोचन 2014

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चिकोटी (ब्यंग्य संग्रह) का विमोचन 2012

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आदरणीय  कुशवाहा जी प्रणाम। कमेन्ट के लिए धन्यवाद ।
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कुछ न कुछ तो कहना ही पड़ेगा , जानी साहब. कब तक बहरे बन कर बैठे रहेंगे. कब तक अपने जज्बातों को मरते हुए देखेंगे. आखिर कब तक. देश के हालात को व्यक्त क...
स्नेही जानी जी , सादर ,बहुत सुन्दर भाव से पूर्ण कविता ,आज की सच्चाई को निरुपित करती हुई . सफल प्रस्तुति हेतु बधाई .
तरस रहे हैं जो खुद, मय के एक कतरे को, एसे शाकी हमें, आखिर शराब क्या देंगे? श्री मनोज कुमार जी , नमस्कार ! क्या बात है ! आपने आदरणीय डॉ . बाली से...