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मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

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अरमान बहुत है......

नेता बनूँ मैं देश का, अरमान बहुत है।
पर क्या करूँ मैं दिल मेँ, ईमान बहुत है।

संसद हो या तिहाड़, कोई फर्क नहीं ज्यादा
चोरों, लुटेरों का यहाँ, सम्मान बहुत है।

भूंखी, बेगार जनता, रोटी को तरसती
और इनके सारे नेता, धनवान बहुत हैं।

मेहनत बिना कमाए जो, दौलत फरेब से
वो शख्स ही तो देते, अब दान बहुत हैं।

जनता की पीर हर सके, अवतार ना बाबा,
सत्संग से कमाते, भगवान बहुत हैं।

शिक्षित ना कर सकीं हैं, बिकती जो डिग्रियाँ,
शिक्षा की हर गली मेँ, दूकान बहुत हैं।

अन्याय हो या जुर्म, ना उठती कोई आवाज,
कहने को तो शहर मेँ, इन्सान बहुत हैं।

जनता नहीं समझती, ये बात नहीं ‘जानी’
सब जानकर भी जनता, अनजान बहुत हैं।

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Bahot bahot Badhiya....

good

Dil ko chhoo gayi....Excellent!!!

Shandar sir...................

अन्याय हो या जुर्म, ना उठती कोई आवाज,
कहने को तो शहर मेँ, इन्सान बहुत हैं।

बहुत सुंदर मनोज भाई......



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आईने के सामने (काव्य संग्रह) का विमोचन 2014

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चिकोटी (ब्यंग्य संग्रह) का विमोचन 2012

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आदरणीय  कुशवाहा जी प्रणाम। कमेन्ट के लिए धन्यवाद ।
मनोज जी, अत्यंत सुंदर व्यंग्य रचना। शायद सत्ताधारियों के लिए भी जनता अब केवल हंसी-मजाक विषय रह गई है. जब चाहो उसका मजाक उड़ाओ और उसी के नाम पर खाओ&...
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