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मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

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पहली नजर में.....

हमारे नौजवान युवक और युवतियां, इश्क और गणित दोनों साथ साथ सीखते हैं। जब वो किसी से नजरें मिलाते हैं तो साथ साथ गणना भी करते जाते हैं। पहली नजर। दूसरी नजर। तीसरी नजर आदि। हम लोग बचपन से सुनते आ रहे हैं कि पहली नजर में प्यार होता है। लेकिन आधुनिक शोध से यह बात पता चली है कि, चौथी नजर में जाकर प्यार होता है। पहली नजर में प्यार नहीं आकर्षण होता है। अब मुझे समझ नहीं आ रहा कि आखिर प्यार –मुहब्बत जैसे विषय में शोध घुसाने या गिनती घुसाने की क्या जरूरत है। अब आदमी नजरें मिलाये कि गिनती करे। अब पहली नजर हो गयी। अब दूसरी और तीसरी। अब जाकर चौथी नजर हुई और अब प्यार होगा। ये प्यार सीखना कम, गणित में गिनती सीखना ज्यादा हो गया। शायरों ने नजर मिलने या आँख लड़ने पर क्या क्या लिख मारा, और हम लोग शोध करने में ही अटके हैं। ‘लड़ने का दिल जो चाहे, तो आँखे लड़ाइए।  हो जंग भी अगर, तो मजेदार जंग हो’। ‘लोग नजरों को भी पढ़ लेते हैं। अपनी आँखों को झुकाये रखना’। मीर साहब के हिसाब से- ‘पैमाना कहे है कोई मय-खाना कहे है। दुनिया तिरी आँखों को भी, क्या क्या न कहे है।’और आजकल लोग हैं कि ‘आँखे चार’ कम,  एक दो तीन चार, ज्यादा कर रहे हैं।  

साहित्य में नजरों का कितना दुष्प्रभाव है, आप शायरी देख लीजिए। नजरों पर बने कुछ मुहावरों पर नजर डालिये। नजर आना, नजर रखना, नजर मिलाना, नजर फेरना, नजर डालना, नजर उठाना, नजरों से गिराना, नजर में समाना, नजरबंद करना, नजर अंदाज करना, नजरें इनायत होना, नजरों का धोखा आदि मुहावरे, नजरों के साहित्यिक दादागीरी को दिखाते ही हैं। अगर नजरों  का हिन्दी अनुवाद कर लिया जाये, तो आप कि ‘आँखे खुली की खुली’ रह जाएंगी।

नेताओं के लिए चुनाव ‘आँखों का कांटा’ है, तो जनता चुनाव के लिए ‘आँखे बिछाए’ रहती है। चुनाव में जनता जिसे ‘आँखों का तारा’ बनाकर ‘सिर आँखों पर बिठाती’ है। जीतने पर वही ‘आँखे चुराने’ लगता है, ‘आँखे फेर लेता’ है। जनता की ‘आँखों में धूल झोंकता’ है, और ‘आँखें दिखाता’ है। पक्ष-विपक्ष जनता को देखकर ‘आँखें मारते’ रहते हैं और ‘आँखें चार’ करते हैं। पाँच साल तक जनता की ‘आँखे डबडबाई’ रहती हैं, नेता की ‘आँखें लग जाती’ हैं, उनकी ‘आँखों पर चरबी छा’ जाती है, तथा जनता और नेता ‘आँख मिचौली’ करते रहते हैं। वो वादे करके ‘आँखें सेंकते’ रहते हैं, और वादों के पूरा होने के इंतजार में इनकी ‘आँखें बन्द हो’ जाती हैं। अगले चुनाव तक वो जनता की ‘आँखों में गिर जाते’ हैं। जनता की ‘आँखें खुल जाती’ हैं, उसकी ‘आँखों पर पड़ा परदा हट’ जाता है। पाँच साल बाद जनता ‘आँख उठाती’ है, पुराने नेता को ‘सीधी आँख नहीं देखती’ तथा किसी और को ‘आंखो में समा’ लेती है।    

खैर, बात हो रही थी पहली नजर की। तो जवानों को ‘पहली नजर’ के प्यार से जो आनन्द आता होगा, उससे कहीं ज्यादा आनन्द मुझ जैसे खूसट को ‘कोर्ट की पहली नजर’ ‘सीबीआई की पहली नजर’ और ‘सीवीसी-सीएजी की पहली नजर’ में आता है। जैसे ही कोर्ट कहती है कि पहली नजर में फलां नेता के खिलाफ आरोप सुनने लायक है। या सीबीआई कहती है कि पहली नजर में फलां नेता या उद्योगपति दोषी लग रहे हैं। या सीवीसी-सीएजी जब कहती है कि पहली नजर में इतने का घोटाला लगता है। तो मेरा दिल खुशी से झूम उठता है कि अब फलां नेता, उद्योगपति या अधिकारी को सजा मिलेगी उसके करतूतों की। लेकिन जैसे पहली नजर का प्यार स्थायी नहीं होता, वैसे ही पहली नजर के मुकदमें, केसें भी स्थायी नहीं होती। बाद में सब ‘नजरों का धोखा’ साबित हो जाता है। कोर्टें जाँच पर ‘नजर रखती’ हैं, जाँच एजेंसियां आरोपियों पर ‘नजरें इनायत’ करती हैं, सबूतों को ‘नजर अंदाज करती’ हैं, और सबूत ‘नजरों से ओझल’ हो जाता है। आरोपी भले ही हमारी ‘नजरों में गिर जाएँ’, लेकिन वो हमेशा ‘नजर उठाकर’ चलते हैं और किसी नए काण्ड पर ‘नजर डालते’ हैं। कोर्ट, सीबीआई, सीएजी अपनी पहली नजर से ‘नजर फेर लेती’ हैं और बाद में उन्हें कुछ नजर नहीं आता। आखिर प्यार भी पहली नजर से नहीं, चौथी नजर से होता है, तो सजा, पहली नजर से कैसे हो जाएगी ??

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Comment

आपकी राय

Wha kya baat hain.

एकदम झन्नाटेदार थप्पड़ की तरह रसीद किया है भाई आपने ये जागरूकता चरस भरा व्यंग्यात्मक लेख। उम्मीद है कि hard-core चरसीयों पर भी भारी पड़े आपका ये जागरूक करने वाला चरस।

आप का व्यंग्य बहुत अच्छा है ,एक चुटकी चरस का असर बहुत है।

Jara saa vyngy roopi charas bhii chakh lenaa chahiye .Dil khush ho jaataa hai.bahut khoob kaha......

सटीक व्यंग्य। फ़िल्म में किसी महा पुरूष या स्त्री का किरदार निभाकर क्या वास्तविक जीवन में भी वैसा होने का दावा कर सकता/सकती है। इसके नकारात्मक पहलू को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता । डायन/ चुड़ैल/ वेश्या / चोर/ डकैत/ बलात्कारी का किरदार निभाने वालों के बारे में केवल कल्पना करें तो...

Bahut khub sir

वास्तविकता यही है। सम्मान की भावना नहीं है कहीं भी।

Waw that's so funny but to the point

Ati uttam sir

उचित कहा, यह हमारी विडंबना है कि हमें हिन्दी पखवाड़ा मनाना पड़ता है |

बहुत सुंदर प्रस्तुति। वास्तव में ये बड़ी विपरीत धारणा हमारे देश मे है कि हिन्दी भाषी लोग पिछड़े होते है शायद इसी कारण अंग्रेजी में बात करना लोग अपनी शान और अग्रिम पंक्ति में बने रहना मानते है। आपको बहुत बधाई। आगे भी आपकी व्यग्य यात्रा और विकसित स्तर पर पहुचे। शुभकामनाये

नारायण सिंह जी, प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद। आपने बहुत सही बात की तरफ ध्यान खींचा है। विधवा के सिर से बिन्दी, की तरफ। ये 9 साल पुराना व्यंग्य है जैसा कि आप तारीख देख रहे होंगे। आगे इस तरह की बातों का ध्यान रखूंगा। दूसरी बात कि भाषण ज्यादा अंग्रेजी में हो गया, यही तो व्यंग्य है।
आपका बहुत आभार।

अतिसुन्दर रचना सर,,,मातृभाषा होते हुए भी बहुत से लोग इंग्लिश बोलना अपनी शान समझते हैं चाहे वो टूटी फूटी इंग्लिश ही क्यो ना बोले।

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आईने के सामने (काव्य संग्रह) का विमोचन 2014

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आदरणीय  कुशवाहा जी प्रणाम। कमेन्ट के लिए धन्यवाद ।
मनोज जी, अत्यंत सुंदर व्यंग्य रचना। शायद सत्ताधारियों के लिए भी जनता अब केवल हंसी-मजाक विषय रह गई है. जब चाहो उसका मजाक उड़ाओ और उसी के नाम पर खाओ&...
कुछ न कुछ तो कहना ही पड़ेगा , जानी साहब. कब तक बहरे बन कर बैठे रहेंगे. कब तक अपने जज्बातों को मरते हुए देखेंगे. आखिर कब तक. देश के हालात को व्यक्त क...
स्नेही जानी जी , सादर ,बहुत सुन्दर भाव से पूर्ण कविता ,आज की सच्चाई को निरुपित करती हुई . सफल प्रस्तुति हेतु बधाई .
तरस रहे हैं जो खुद, मय के एक कतरे को, एसे शाकी हमें, आखिर शराब क्या देंगे? श्री मनोज कुमार जी , नमस्कार ! क्या बात है ! आपने आदरणीय डॉ . बाली से...