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मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

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चलने भी दो यारों....

चलना और चलाना हमारे डीएनए में है। हम भारत के लोग, ‘सब चलता है’कहकर, कुछ भी चला सकते हैं। पप्पू नेता बन जाये, चलता है। फेंकू मंत्री बन जाये, चलता है। यहाँ तक कि नेता के बिना भी देश चला सकते हैं। अफसर के बिना आफिस चलता है। ड्राइवर के बिना गाड़ी चलती भी है और फुटपाथ पर भी चढ़ जाती है। हमारे न्यायालयों में, हत्यारे के बिना हत्या हो जाती है। वह भी चलता है। न्याय के बिना गरीब भी चलता है। धर्म के बिना पुजारी चलता है। अपनी जाति वाला भ्रष्टाचारी भी चलता है।

अगर इस देश में कुछ नहीं चलता या चलती है, तो वह दो चीजें हैं। पहला ‘कुर्सी’ के बिना नेता। और दूसरा हंगामें के बिना संसद। कभी कभी मजबूरी में, कुर्सी के बिना नेता तो चल जाता है, संसद तो हंगामें के बाद भी नहीं चलती। और संसद का ना चलना भी एक जादू है। एसा जादू जिसे जादूगर पीसी सरकार भी सात जन्म तक नहीं कर पायेंगे।

सुबह शाम टीवी पर सभी सांसद कहते कहते थेथर हो जाते हैं कि संसद चलना चाहिए। सरकार के हों या विपक्ष के, सभी सांसदों की, टीवी पर यही अंतिम इच्छा होती है कि संसद चले। टीवी पर सभी संसद को चलाने के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगाते रहते हैं। कोई भी संसद को नहीं रोकता। फिर भी संसद है कि नहीं चलती। और यही सबसे बड़ा जादू है। विश्व का आठवां आश्चर्य। जनता के लिए, संसद ना चलना भी ‘चलता है’।

परन्तु इन टीवी चैनलों का क्या करें? टीवी चैनल और उसके एंकर, हलकान हैं। स्टूडियो में बैठे विशेषज्ञ, परेशान हैं। कि संसद क्यों नहीं चलती? सभी जनता के हित चिंतक, पानी पी-पी कर एक दूसरे पर संसद न चलने देने का आरोप लगा रहे हैं। जबकि सभी सांसद स्टूडियों में संसद चलाने को आतुर रहते हैं। पता नहीं सरकार संसद को संसद में क्यों चलाना चाहती है? अगर वह संसद को टीवी स्टूडियो में चलाए तो जरूर चलेगी। लेकिन सरकार असहिष्णु जो ठहरी। संसद को संसद में चलाने का तानाशाही रुख अपनाए बैठी है। जबकि सरकार और विपक्ष, टीवी स्टूडियो में कैमरे को दिखा-दिखा कर संसद चलाने की कसमें खा रहे हैं। लेकिन संसद है कि चलने का नाम ही नहीं ले रही है।

हाँ, संसद की कैंटीन और कैंटीन में दो रुपये की सब्सिडी वाली बिरयानी खूब चल रही है। संसद आने जाने के भत्ते भी खूब चल रहे हैं। जनता को तो सब कुछ चलता है। संसद कैंटीन की दो रुपये की सब्सिडी वाली बिरयानी से जनता के पेट में मरोड़ भले ना हो, पर सरकार को जनता की गैस सब्सिडी से, पेट में गैस जरूर बन रही है।

ये बात नहीं है कि संसद कभी नहीं चलती। सांसदों के वेतन-भत्ते बढ़ाने हों, उनकी सुख-सुविधाएँ बढ़ानी हों, तो संसद चलती ही नहीं, दौड़ती है। लेकिन जनता से जुड़े मुद्दों पर रेंगती भी नहीं। कभी विपक्षी सांसद को छींक आ जाती है, तो संसद ठप। कभी सांसदों का अपने घर में बीबी से झगड़ा हुआ, संसद ठप। कभी किसी सांसद के घर में बच्चा हुआ तो इसे ‘विरोधियों की साजिश,‘राजनीतिक साजिश’कहकर, संसद ठप। अब इससे पहले कि देश की जनता, इन सांसदों को संसद से ही चलता कर दे, मेरी उन महामहिमों से गुजारिश है कि संसद को, चलने भी दो यारों...

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Comment

आपकी राय

आजकल के हालात पर करारा तमाचा काश सारी जनता समझ सके

बहुत बढ़िया।

क्या किया जाए सर।।
UPSC आप बिना अंग्रेजी पास नही कर सकते, कोर्ट HC and SC की सरकारी भाषा अंग्रेजी है, ट्रैन के ac में बैठकर आप अंग्रेजी न बोलो तो लोग जाहिल समझते है और उससे भी बड़ी बात यदि किसी पर हिंदी में गुस्सा उतार दिए तो गाली देगा अंग्रेजी में उतार दिए तो चुपचाप सुन लेगा , डर जाएगा।।
ऐसी स्थिति में हिंदी का राष्ट्रव्यापी होना मुश्किल है, पर राजभाषा है तो वार्षिक ही सही जश्न मनाना बनता है।।
हिंदी के प्रोत्साहन कार्यक्रम पर आप इनाम की रकम और मिठाई का डब्बा हटा कर देखिये कैसे भाग लेने वाले अधिकारियों कर्मचारियों में कमी आएगी।।
फिर भी मुबारक आपने इस ओर ध्यान दिया।।

चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात वाली कहावत हिंदी पखवाणा के लिए चरितार्थ हो रही है नाम मातृभाषा है उसके प्रचार प्रसार के लिए इतना कुछ करना पडता है । अफसोस??

महान व्यंग्य महान सेवक की पहचान बताने के लिए

बहुत ही बेहतरीन समकालीन व्यंग्य आदरणीय

लाजवाब मनोजजी

Manoj Jani bolta bahi jo he sahi soach ka badsah jani

वाह! साहेब जी, खूबसूरत ग़ज़ल बनाये हैं।

Behtreen andaj!!Ershad!!!

वहुत अच्छी लगी

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आईने के सामने (काव्य संग्रह) का विमोचन 2014

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चिकोटी (ब्यंग्य संग्रह) का विमोचन 2012

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आदरणीय  कुशवाहा जी प्रणाम। कमेन्ट के लिए धन्यवाद ।
मनोज जी, अत्यंत सुंदर व्यंग्य रचना। शायद सत्ताधारियों के लिए भी जनता अब केवल हंसी-मजाक विषय रह गई है. जब चाहो उसका मजाक उड़ाओ और उसी के नाम पर खाओ&...
कुछ न कुछ तो कहना ही पड़ेगा , जानी साहब. कब तक बहरे बन कर बैठे रहेंगे. कब तक अपने जज्बातों को मरते हुए देखेंगे. आखिर कब तक. देश के हालात को व्यक्त क...
स्नेही जानी जी , सादर ,बहुत सुन्दर भाव से पूर्ण कविता ,आज की सच्चाई को निरुपित करती हुई . सफल प्रस्तुति हेतु बधाई .
तरस रहे हैं जो खुद, मय के एक कतरे को, एसे शाकी हमें, आखिर शराब क्या देंगे? श्री मनोज कुमार जी , नमस्कार ! क्या बात है ! आपने आदरणीय डॉ . बाली से...