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मनोज जानी

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चलने भी दो यारों....

December 13, 2015

चलना और चलाना हमारे डीएनए में है। हम भारत के लोग, ‘सब चलता है’कहकर, कुछ भी चला सकते हैं। पप्पू नेता बन जाये, चलता है। फेंकू मंत्री बन जाये, चलता है। यहाँ तक कि नेता के बिना भी देश चला सकते हैं। अफसर के बिना आफिस चलता है। ड्राइवर के बिना गाड़ी चलती भी है और फुटपाथ पर भी चढ़ जाती है। हमारे न्यायालयों में, हत्यारे के बिना हत्या हो जाती है। वह भी चलता है। न्याय के बिना गरीब भी चलता है। धर्म के बिना पुजारी चलता है। अपनी जाति वाला भ्रष्टाचारी भी चलता है।

अगर इस देश में कुछ नहीं चलता या चलती है, तो वह दो चीजें हैं। पहला ‘कुर्सी’ के बिना नेता। और दूसरा हंगामें के बिना संसद। कभी कभी मजबूरी में, कुर्सी के बिना नेता तो चल जाता है, संसद तो हंगामें के बाद भी नहीं चलती। और संसद का ना चलना भी एक जादू है। एसा जादू जिसे जादूगर पीसी सरकार भी सात जन्म तक नहीं कर पायेंगे।

सुबह शाम टीवी पर सभी सांसद कहते कहते थेथर हो जाते हैं कि संसद चलना चाहिए। सरकार के हों या विपक्ष के, सभी सांसदों की, टीवी पर यही अंतिम इच्छा होती है कि संसद चले। टीवी पर सभी संसद को चलाने के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगाते रहते हैं। कोई भी संसद को नहीं रोकता। फिर भी संसद है कि नहीं चलती। और यही सबसे बड़ा जादू है। विश्व का आठवां आश्चर्य। जनता के लिए, संसद ना चलना भी ‘चलता है’।

परन्तु इन टीवी चैनलों का क्या करें? टीवी चैनल और उसके एंकर, हलकान हैं। स्टूडियो में बैठे विशेषज्ञ, परेशान हैं। कि संसद क्यों नहीं चलती? सभी जनता के हित चिंतक, पानी पी-पी कर एक दूसरे पर संसद न चलने देने का आरोप लगा रहे हैं। जबकि सभी सांसद स्टूडियों में संसद चलाने को आतुर रहते हैं। पता नहीं सरकार संसद को संसद में क्यों चलाना चाहती है? अगर वह संसद को टीवी स्टूडियो में चलाए तो जरूर चलेगी। लेकिन सरकार असहिष्णु जो ठहरी। संसद को संसद में चलाने का तानाशाही रुख अपनाए बैठी है। जबकि सरकार और विपक्ष, टीवी स्टूडियो में कैमरे को दिखा-दिखा कर संसद चलाने की कसमें खा रहे हैं। लेकिन संसद है कि चलने का नाम ही नहीं ले रही है।

हाँ, संसद की कैंटीन और कैंटीन में दो रुपये की सब्सिडी वाली बिरयानी खूब चल रही है। संसद आने जाने के भत्ते भी खूब चल रहे हैं। जनता को तो सब कुछ चलता है। संसद कैंटीन की दो रुपये की सब्सिडी वाली बिरयानी से जनता के पेट में मरोड़ भले ना हो, पर सरकार को जनता की गैस सब्सिडी से, पेट में गैस जरूर बन रही है।

ये बात नहीं है कि संसद कभी नहीं चलती। सांसदों के वेतन-भत्ते बढ़ाने हों, उनकी सुख-सुविधाएँ बढ़ानी हों, तो संसद चलती ही नहीं, दौड़ती है। लेकिन जनता से जुड़े मुद्दों पर रेंगती भी नहीं। कभी विपक्षी सांसद को छींक आ जाती है, तो संसद ठप। कभी सांसदों का अपने घर में बीबी से झगड़ा हुआ, संसद ठप। कभी किसी सांसद के घर में बच्चा हुआ तो इसे ‘विरोधियों की साजिश,‘राजनीतिक साजिश’कहकर, संसद ठप। अब इससे पहले कि देश की जनता, इन सांसदों को संसद से ही चलता कर दे, मेरी उन महामहिमों से गुजारिश है कि संसद को, चलने भी दो यारों...

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