हम भारतीयों में एक खास किस्म की अंतरराष्ट्रीय आत्मा पायी जाती है। हम अमेरिका की स्वास्थ्य नीति, फ्रांस के किसान आंदोलन, इजराइल-गाजा संघर्ष, यूक्रेन-रूस युद्ध, और यहां तक कि अफ्रीका के जंगलों में मर रहे गैंडे तक पर इतनी गहराई से चर्चा कर लेते हैं, कि CNN और BBC वाले भी जल-भुन जाते होंगे। असल बात ये है कि इन मुद्दों पर असली ज्ञान तो हम जैसे ग्लोबल ज्ञानी ही देते हैं, वरना सीएनएन और बीबीसी की क्या विसात जो कोई जानकारी पता लगा लें।
हमारे इस अद्भुत देश में हर गली, हर नुक्कड़, हर चाय की दुकान पर कम से कम दो "विदेश नीति विशेषज्ञ" जरूर मिल जाते हैं। इनके ज्ञान की सीमा इतनी व्यापक होती है कि संयुक्त राष्ट्र (UN) के स्थायी सदस्य भी शर्मा जाएं। यह ज्ञान आमतौर पर ‘टी स्टॉल थिंक टैंक’ से निकलता है, जहां एक कप चाय और परचून की दुकान वाला रेडियो मिलकर पूरी अंतरराष्ट्रीय राजनीति की बुनियाद रख देते हैं।
इन्हें अमेरिका के इलेक्शन में धांधली की खबर होती है, ब्राज़ील के जंगलों में लगी आग की चिंता होती है, चीन की GDP की चाल पता होती है, और अफगानिस्तान में महिलाओं की हालत पर गहरा दुख भी।
हमारे देश में रहकर, विदेश के हर मुद्दे, हर समस्या पर ज्ञान देने वाले ग्लोबल ज्ञानी, सभी चौक-चौराहों पर पाए जाते हैं। सोशल मीडिया का युद्धक्षेत्र हो या, आफिस का कार्यक्षेत्र, हर जगह कुछ ग्लोबल ज्ञानी विराजमान रहते हैं। वे बताते हैं कि जर्मनी में शिक्षा मुफ्त है, नॉर्वे में जेलें होटल जैसी होती हैं, जापान में ट्रेनें सेकंड भर भी लेट नहीं होतीं, और स्विट्ज़रलैंड में बच्चे टैक्स की परिभाषा लेकर पैदा होते हैं। चाइना टेक्नॉलजी में अमेरिका से आगे है। ईरान- इजरायल युद्ध में अब ईरान का नामोनिशान मिट जाएगा। यूक्रेन से रूस क्यों नहीं जीत पा रहा है?
एसे ही एक ग्लोबल ज्ञानी हमारे पड़ोस में भी पाए जाते हैं। गोवर्धन पंडित। एकदम गोवर्धन पहाड़ जैसे ज्ञान के शिखर पर पहुंचे हुए। एकाएक रास्ते में टकरा गए। मैंने पूँछा, अरे पंडिज़्जी कहाँ भागे जा रहे? वो बोले- क्या बताऊँ भाई, बच्चे के एड्मिशन के लिए स्कूल-स्कूल चक्कर लगा रहा हूँ। सब लाखों की फीस मांग रहे। मैंने कहा- हाँ, महंगाई बहुत बढ़ गई है। वो तुरंत बोले- महंगाई- वहँगाई कुछ नहीं। सब लूट है। आपको पता है, भूटान में पूरी शिक्षा फ्री है। जिसको जितना भी पढ़ना हो, सरकार पूरा खर्च उठाती है।
मैंने पूँछा- आप तो धनी आदमी हैं। आपको क्या परेशानी, लाख दो लाख देने में ? वो बोले- अभी पिछले महीने पिताजी बीमार हुए थे, उनके इलाज में प्राइवेट हास्पिटल ने 3-4 लाख रुपये चूस लिए। बहुत महंगा है प्राइवेट इलाज कराना । मैंने सहमति में सिर हिलाते हुए कहा- हाँ वो तो है। तभी वो ज्ञान देने वाली मुद्रा में बोले- आपको पता है? भूटान में इलाज भी बिल्कुल मुफ़्त है। कोई प्राइवेट मेडिकल स्टोर तक नहीं होता। सबको सिर्फ सरकारी हास्पिटल में इलाज मिलता है।
मैनें पूँछा- पंडिज़्जी! जब आपको इतना पता है, तो अपने देश में मुफ़्त शिक्षा और मुफ़्त स्वास्थ्य की मांग सरकार से क्यों ना की जाए? इसके लिए क्यों ना आंदोलन किया जाए?
वो तुरंत बात काटते हुए बोले- जानी भाई, अब आप पोलिटिकल बात कर रहे हो। हर जगह राजनीति नहीं करनी चाहिए।
मैंने पूँछा- इसमें राजनीति क्या है? मैंने आपके शहर के एम.एल.ए के बारे में थोड़े पूँछा है? वो बड़े तिरस्कार से बोले- अरे, ये सब राजनीति मुझे पसंद नहीं... मैं तो ग्लोबल सोच रखता हूं!
मैंने पूँछा- अच्छा, आपको पता है आज अपने मोहल्ले में पानी क्यों नहीं आया?" उनका जवाब मिला – “वो सब साजिश है... असल बात ये है कि अमरीका में पानी को लेकर तीसरा वर्ल्ड वॉर होने वाला है।”
मैंने बात बदलने की नीयत से कहा- वैसे इतनी महंगी पढ़ाई करने के बाद भी नौकरी की कोई गारंटी नहीं है। बेरोजगारी बहुत बढ़ गई है। उन्होंने तुरंत टोका- अमेरिका में तो बेरोज़गारी का रेट 3.2% हो गया है भाई, बड़ा खतरा है दुनिया को! और पता है? चीन जो अफ्रीका में इन्वेस्ट कर रहा है न, वो असल में कूटनीतिक जाल है!
मैंने फिर से अपने लोकल समस्याओं की याद दिलाना चाहा- पंडिज़्जी! ये अपने मोहल्ले में सीवेज लाइन टूटी हुई है, और सड़कों में इतने गड्ढे हो गए हैं, इसकी शिकायत नगरपालिका से की जाए या नहीं? इस पर वो बोले- अरे छोड़ो न, यहां तो कुछ होता ही नहीं। अपने यहाँ का सिस्टम ही खराब है। इस देश का सिस्टम करप्ट हो चुका है। वैसे आपने देखा क्या, कल बाइडन ने पुतिन को क्या बोला?
मैंने जानना चाहा – आखिर ये सिस्टम क्या होता है? इसमें नेता-अधिकारी-सरकार आती है या नहीं?
वो बोले- ये सब फालतू की बातें छोड़ो यार। देखो भारत को तो अब क्वाड से हट जाना चाहिए... देखो रूस कैसे बैलेंस कर रहा है!
मैंने चौंकते हुए पूँछा- ये क्वाड क्या होता है?
तो बोले- यार, वो मतलब… एक तरह का डिफेंस ग्रुप टाइप चीज़ है... इंडिया उसमें है बस, इतना काफी है।
मैंने फिर से उन्हें देश की ओर खींचने के लिए पूँछा- ये बिहार इलेक्शन में वोटर लिस्ट बनाने में क्या गड़बड़ हो रही है? आपको कुछ पता है? उन्होंने तुरंत कहा- भाई हमें तो ये फ़िक्र होती है कि स्विट्ज़रलैंड में युवाओं को किस उम्र में वोटिंग राइट्स मिलते हैं। और आप बिहार में उलझे पड़े हैं।
मैंने झुँझलाते हुए कहा- आपको कुछ देश के बारे में भी पता है? अपने देश में कितने राज्य हैं? देश की महंगाई दर, बेरोज़गारी दर, शिक्षा-स्वास्थ्य की हालत या किसानों की आत्महत्याओं
के बारे में भी कुछ पता है?
उन्होंने बड़े ही ज्ञान भाव से कहा– अरे भाई, वो सब तो गूगल कर लेना… लेकिन देखो ये इजराइल और हमास वाला मुद्दा बहुत गंभीर है। आपको “जियोपॉलिटिक्स की नई धारा” और “मल्टीपोलर वर्ल्ड ऑर्डर” के बारे में जानना चाहिए।
एसे भारी भरकम शब्द सुनकर तो मेरा दिमाग ही चकरा गया। सम्भलते सम्भलते मैंने व्यंग करना चाहा- पंडिज़्जी, ये आप इतनी विदेशी राजनीति की बात कर रहे हैं, अपने यहाँ चुनाव में वोट देने गए थे या नहीं?
इस पर उनका जवाब सुनकर मैंने सिर खुजाते हुए आगे सरकने में ही अपनी भलाई समझी। वो बोले- “अरे यार, लाइन बहुत लंबी थी… वैसे भी सब एक जैसे ही हैं!”































































