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मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

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गजलों की सूची

गजल / कविता

जनता की आह यूँ ही, बेकार नहीं होती ....

जनता की आह यूँ ही, बेकार नहीं होती ।
केवल फतह, फरेब से, हर बार नहीं होती।

खुद पे हो भरोस…

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लोग मरते रहे ....

लोग मरते रहे, छटपटाते रहे।
अपने-अपने मसीहा, बुलाते रहे।

वक्त ही ना मिला, उन मसीहाओं को,…

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हम आदमी ही आदमी का, मांस खा रहे हैं....

एक दूसरे  को  हिंदू , मुस्लिम  जला रहे हैं।
हम आदमी ही आदमी का, मांस खा रहे हैं।

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चन्द चेहरे जो, तमतमाए हैं...

चन्द चेहरे जो, तमतमाए हैं।
आइने शाह को, दिखाये हैं।        (1)

साजिशें देखना, हवाओं की,…

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हर कीमत पर जो बिकने को...

हर कीमत पर जो बिकने को, बैठे हैं बाजारों में।
भ्रस्टाचार वो ढूंढ रहे हैं, औरों…

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हम उनका कहना तो, हर बार मान लेते हैं.

हम उनका कहना तो, हर बार मान लेते हैं.
जो झूठे वादों से, हम सबकी जान लेते हैं.

कहा था…

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…मुद्दों पे बातें, मना है।

आजकल के मुद्दों पे, बातें मना है 
क्योंकि ये सरकार की, आलोचना है। 

मर गये सैनिक…

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वादों का कभी, हिसाब नहीं मिलता

उनके वादों का कभी, हिसाब नहीं मिलता।
सवाल तो बहुत हैं, पर जबाब नहीं मिलता।

जो भी…

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यूँ तो मयखाने से हम दूर बहुत रहते हैं

यूँ तो मयखाने से, हम दूर बहुत रहते हैं।
तेरे नशे में मगर, चूर बहुत रहते हैं।

हम …

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फिरता है...

वो मेरे कत्ल का, सामान लिए फिरता है।
सिर्फ हिंदू, या मुसलमान किए फिरता है।

जवानि…

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कैसी लगी रचना आपको ? जरूर बताइये ।

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आपकी राय

आप बहुत अच्छा लिखते है आप के व्यंग काबेले तारीफ़ है

बहुत खूब मनोज। बेहतरीन लेख और शानदार व्यंग्य शैली। सच्चाई को लिखने का यह अंदाज काबिले तारीफ़ है। इसे जारी रखिए।

गजब लिखते हो मनोज जी मजा आ गया पढ़कर

सोचने का तरीका बदल दिया या फिर मैं पहले सोच ही नहीं रहा था ।
आंखे खुली होने के बावजूद दिख वहीं रहा था जो सुन रहा था ।
बहुत शानदार....

क्या व्यंग लिखा है सर पढ़कर मजा ही आ गया।

ये लाइन दिल को छू गया।। जबरदस्त observation

बहुत सुन्दर कवि जी. जहाँ न पहुंचे रवि, वहाँ पहुंचे कवि मनोज.

बहुत अच्छा सर। शब्द का सही अर्थ समझाया है आपने.

जो जितना लोगो पर निर्भर है वही आत्मनिर्भर कहलाता है।।।
Great सर
बधाई शानदार व्यंग्य

यथार्थ व्यंग्य सटीक

Jabardast byang kiya he bade bhai...

सच में रिषिवर आपकी जय हो।व्यंग्य काविले तारीफ है। ।

राजनीतिक परिदृश्य में एक सुंदर व्यंगात्मक लेख ।
आपको प्रणाम

Very nice manoj ji

आज तो अकेला चना , अपने बाजे घना रूप से भाड़ फोड़ने में लगा है।।
बहुत बढ़िया सर

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आईने के सामने (काव्य संग्रह) का विमोचन 2014

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चिकोटी (ब्यंग्य संग्रह) का विमोचन 2012

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अन्यत्र

आदरणीय  कुशवाहा जी प्रणाम। कमेन्ट के लिए धन्यवाद ।
मनोज जी, अत्यंत सुंदर व्यंग्य रचना। शायद सत्ताधारियों के लिए भी जनता अब केवल हंसी-मजाक विषय रह गई है. जब चाहो उसका मजाक उड़ाओ और उसी के नाम पर खाओ&...
कुछ न कुछ तो कहना ही पड़ेगा , जानी साहब. कब तक बहरे बन कर बैठे रहेंगे. कब तक अपने जज्बातों को मरते हुए देखेंगे. आखिर कब तक. देश के हालात को व्यक्त क...
स्नेही जानी जी , सादर ,बहुत सुन्दर भाव से पूर्ण कविता ,आज की सच्चाई को निरुपित करती हुई . सफल प्रस्तुति हेतु बधाई .
तरस रहे हैं जो खुद, मय के एक कतरे को, एसे शाकी हमें, आखिर शराब क्या देंगे? श्री मनोज कुमार जी , नमस्कार ! क्या बात है ! आपने आदरणीय डॉ . बाली से...