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मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

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लौट के बुद्धू घर को आए.......

बचपन से ही यह मुहावरा सुनते आ रहा हूँ कि,‘लौट के बुद्धू घर को आए’। लेकिन आजतक इसका मतलब समझ नहीं आया। पहले तो बुद्धू का मतलब बुद्धिमान होता है कि बेवकूफ, यह समझ नहीं आया। जैसे ‘अक़्लमंद’ का मतलब मंद अक्ल वाला या ज्यादा अक्ल वाला होता है, एक कन्फ़्यूजन है। अब अगर बुद्धू का मतलब, बेवकूफ माने, तो बुद्धिमान लोग लौट के कहाँ जाते हैं, (घर के अलावा) यह भी सोचनीय विषय है। कहीं पर यह तो पढ़ा था कि बुद्ध कभी घर नहीं लौटते।यानि घर तो बुद्धू ही लौटते हैं, यह कनफर्म है। इसका दूसरा मतलब यह भी है कि बुद्धू तो ‘लौट’ के घर आते हैं, लेकिन समझदार ‘सीधे’ घर आ जाते हैं?

      यह मुहावरा, बुद्धू के साथ घटने वाली आगे की घटनाओं पर साइलेण्ट है। मसलन बुद्धू के घर लौटने के बाद क्या उसके घरवालों ने उसे घर में घुसने दिया या नहीं? उसका स्वागत हुआ या दुत्कार? खैर हमें इससे क्या? हमारा मकसद तो ‘लौट के बुद्धू घर को आए’ मुहावरे को जानने का है। क्योंकि आजकल बुद्धूओं के घर लौटने का मौसम आया हुआ है।

      वैसे बुद्धूओं के घर लौटने का एक खास मौसम होता है। जब भी चुनाव आने वाला होता है, बहुत से बुद्धू, घर लौटने के लिए बेकरार होने लगते हैं। और उनके घर वाले भी ‘कब के बिछड़े हुये हम आज कहाँ आ के मिले’ वाली स्टाइल में, घर लौटे बुद्धू को गले लगाने को बेताब रहते हैं। क्योंकि दोनों की निगाह में चुनाव और कुर्सी होती है। ये बात अलग है कि घर छोड़ने के बाद सालों तक बुद्धू ने घरवालों को और घरवालों ने बुद्धू को, गाली दी, लानत-मलानत भेजी, भ्रष्ट-बेईमान कहा, विनाश-पुरुष कहा, साम्प्रदायिक कहा। लेकिन कहने से क्या? बेचारे बुद्धू जो ठहरे, कुछ भी कह सकते हैं। जैसे प्रेम और युद्ध में सब जायज है, वैसे ही राजनीति में भी सबकुछ जायज है।

      चुनाव का मौसम ही एसा होता है कि बुद्धू तो घर लौटते ही हैं, सुबह का भूला भी शाम को घर लौटने लगते हैं। वैसे कहा जाता है कि अगर सुबह का भूला शाम को घर आ जाये तो उसे भूला नहीं कहते। ये बात अलग होती है कि सुबह का भूला शाम को नहीं बल्कि कई कई सालों बाद घर लौटता है फिर भी उसे भूला नहीं कहते। ये तो राजनीति का चमत्कार है कि बीस बीस साल बाद भी बुद्धू हो या सुबह का भूला, लौट के घर वापस आ जाते हैं, और उसे भूला नहीं कहते।

      चुनाव की खुमारी या नशा ही एसा होता है कि वरषो के भूले हुये बुद्धू, खुद तो घर लौटते ही हैं, दूसरे बुद्धूओं को भी घर लौटने का न्योता देने लगते हैं। और दूसरे बुद्धू भी घर लौटने की सोचने लगते हैं। वैसे चुनाव के नजदीक आते ही बुद्धू घर लौटने के बारे में सोचने लगते हैं। चुनाव घोषित होते ही घर लौटना शुरू कर देते हैं। चुनाव खत्म होते होते सभी बुद्धू अपने अपने घरों को लौट चुके होते हैं। कुछ बड़े वाले बुद्धू चुनाव जीतने पर भी,मंत्री ना बन पाने पर घर लौट जाते हैं। और जनता, बुद्धूओं के इस तरह की घर वापसी पर तालियाँ बजाती रह जाती है, और असली बुद्धू बनती रही है। सालों से यही होता रहा है कि लौट के बुद्धू घर को आए और जनता को बुद्धू बनाए। देखना है जनता कब इन बुद्धूओं को असली बुद्धू बनाती है? या हमेशा खुद ही बुद्धू बनती रहेगी?

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चुनाव का मौसम ही एसा होता है कि बुद्धू तो घर लौटते ही हैं, सुबह का भूला भी शाम को घर लौटने लगते हैं। वैसे कहा जाता है कि अगर सुबह का भूला शाम को घर आ जाये तो उसे भूला नहीं कहते। ये बात अलग होती है कि सुबह का भूला शाम को नहीं बल्कि कई कई सालों बाद घर लौटता है फिर भी उसे भूला नहीं कहते। ये तो राजनीति का चमत्कार है कि बीस बीस साल बाद भी बुद्धू हो या सुबह का भूला, लौट के घर वापस आ जाते हैं, और उसे भूला नहीं कहते। ​गजब का व्यंग्य लिखा है मनोज कुमार जी ! सही कहा आपने की बुद्धू के घर लौटने का सही समय चुनाव का मौसम होता है ! एक आध बुद्धू का नाम भी अगर आ जाता तो बात में और भी जान आ जाती ! पोस्ट छोटी करने के चक्कर में आपने नाम उजागर नहीं किये शायद !



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आईने के सामने (काव्य संग्रह) का विमोचन 2014

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चिकोटी (ब्यंग्य संग्रह) का विमोचन 2012

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आदरणीय  कुशवाहा जी प्रणाम। कमेन्ट के लिए धन्यवाद ।
मनोज जी, अत्यंत सुंदर व्यंग्य रचना। शायद सत्ताधारियों के लिए भी जनता अब केवल हंसी-मजाक विषय रह गई है. जब चाहो उसका मजाक उड़ाओ और उसी के नाम पर खाओ&...
कुछ न कुछ तो कहना ही पड़ेगा , जानी साहब. कब तक बहरे बन कर बैठे रहेंगे. कब तक अपने जज्बातों को मरते हुए देखेंगे. आखिर कब तक. देश के हालात को व्यक्त क...
स्नेही जानी जी , सादर ,बहुत सुन्दर भाव से पूर्ण कविता ,आज की सच्चाई को निरुपित करती हुई . सफल प्रस्तुति हेतु बधाई .
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