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मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

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फिरता है।

वो मेरे कत्ल का, सामान लिए फिरता है।

सिर्फ हिंदू, या मुसलमान किए फिरता है।

 

जवानियों में, वो ढूँढे हसीन कातिल को ।

अपने ही कत्ल का, अरमान लिए फिरता है।

 

भूंखे रहकरके भी, वो जी रहा महँगाई में,

जिंदगी पर भी वो, एहसान किए फिरता है।

 

उनकी हसरत है कि, साँसों पे भी पाबंदी हो।

दाल खाओगे या मुर्गा, ये फरमान लिए फिरता है।

 

वोट के ही लिए, फैली है उसकी झोली,

कभी अल्ला, कभी भगवान, किए फिरता है।

 

गरीबी बेंचकर, ‘जानी’, अमीर होता है।

सिर पे मुद्दों कि वो दुकान लिए फिरता है।

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बहुत खूब सर

जबरदस्त



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आईने के सामने (काव्य संग्रह) का विमोचन 2014

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चिकोटी (ब्यंग्य संग्रह) का विमोचन 2012

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तरस रहे हैं जो खुद, मय के एक कतरे को, एसे शाकी हमें, आखिर शराब क्या देंगे? श्री मनोज कुमार जी , नमस्कार ! क्या बात है ! आपने आदरणीय डॉ . बाली से...