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मनोज जानी

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निर्भरता में आत्मनिर्भर ... (व्यंग्य)

मानव जब से इस पृथ्वी पर अवतरित होता है, तब से लेकर मरने तक बस आत्मनिर्भर बनने की कोशिश में लगा रहता है। क्योंकि पुरखों की जमात हमेशा से, आने वाली पीढ़ी को आत्मनिर्भर बनने के मंत्र देती रही है। उसे अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए उकसाती रही है। लेकिन मनुष्य बचपन में माँ-बाप पर निर्भर रहता है, तो जवानी में पति/पत्नी पर निर्भर रहते हैं, और बुढ़ापे में बच्चों पर निर्भर हो जाते हैं। हालांकि आत्मनिर्भर बनने की प्रक्रिया आजीवन चलती रहती है। इसी तरह जनता को आत्मनिर्भर बनाने का कार्यक्रम तब से चल रहा है जब सरकारें खुद बैशाखियों के सहारे चला करती थीं, और आज भी चल रहा है जब सरकार इतनी मजबूत है कि विपक्ष को सहारे के लिए वैशाखी तक नहीं मिल रही है।

आत्मनिर्भरता नेताओं के नारों की तरह होती है, सुनने में बहुत अच्छी लगती है, वोट भी दिलाती है, जनता को विश्वास भी होता है कि एसा होगा जरूर। जबकि नेता को खुद पता होता है कि उसके नारे सिर्फ पब्लिक को लुभाने के लिए उछाले गए जुमले हैं। फिर भी लोग नारों को सुनते भी हैं, ताली-थाली भी बजाते हैं और वोट भी देते हैं। इसी तरह आत्मनिर्भरता है, जो की वास्तव में मृग मरीचिका है, जिसके पीछे सब दौड़ते हैं, लेकिन वो होता नहीं है। आत्मनिर्भरता समाज में स्टेटस सिंबल है। जो लोग आत्मनिर्भर होते हैं, समाज में उनकी बहुत ही इज्जत होती है। जब कोई आदमी बड़े पद पर पहुँच जाता है, अच्छी आमदनी कमाने लगता है। घर साफ करने, कपड़े धोने, खाना बनाने के लिए बाई (पर निर्भर) हो, आफिस या काम पर जाने के लिए ड्राइवर (पर निर्भर) हो, आफिस में चाय-पानी पीने से लेकर प्रिन्ट-आउट निकालने के लिए कर्मचारी (पर निर्भर) हो, महिला है तो बच्चों के लिए क्रेच (पर निर्भर) हो, एसे व्यक्तियों को समाज आत्मनिर्भर कहकर बहुत इज्जत देता है। जो जितना ज्यादा लोगों पर निर्भर हो, वो उतना ही बड़ा आत्मनिर्भर कहलाता है।

जब से मोदी जी ने आत्मनिर्भर होने का नारा दिया है, तब से जिसे देखो वही आत्मनिर्भर हुआ जा रहा है। कोई किसी पर डेपेण्ड ही नहीं रहा। यहाँ तक कि अब ट्रेनें भी पटरियों पर या ट्रैकों पर निर्भर नहीं रहीं। यहाँ तक कि सिग्नलों पर भी निर्भर नहीं रही, बल्कि पूरी तरह आत्मनिर्भर हो गयी। इतना आत्मनिर्भर कि लाक डाउन में यूपी के मजदूरों को लेकर मुंबई से गोरखपुर के लिए निकली ट्रेन, उड़ीसा चली गयीं। बेंगलुरु के चिक्काबनावारा स्टेशन से रवाना हुई ट्रेन, बस्ती के बजाय गाजियाबाद पहुंच गई। एक दो नहीं, 40 ट्रेनें आत्मनिर्भर होकर, कहीं के लिए चलीं, लेकिन कहीं और पहुँच गई। 70 साल में पहली बार एसा हो रहा है कि ट्रेनें, इतनी आत्मनिर्भर हो गयी हैं कि मनमर्जी स्टेशनों को चली जा रही हैं।

जब ट्रेनें आत्मनिर्भर हो गईं, तो उनको चलाने वाला डीजल-पेट्रोल क्यों पीछे रहता। पहले पेट्रोल-डीजल के दाम, विदेश से आयात होने वाले इनके कच्चे तेल के दामों पर निर्भर करता था। लेकिन आजकल वो भी फुल्ली आत्मनिर्भर होकर टुल्ली हो गया है। कच्चे तेल के दाम 120 डालर प्रति बैरल से घटते-घटते 30 डालर प्रति बैरल पर आ गया तो पेट्रोल-डीजल के दाम 60 रुपए प्रति लीटर से बढ़ते-बढ़ते 80 रु लीटर हो गया। हमेशा पिछलग्गू रहने वाला डीजल, आजकल आत्मनिर्भर होकर पेट्रोल से भी आगे निकल गया है।

मोदी जी की सलाह मानकर, कांग्रेस, इधर राहुल गांधी को आत्मनिर्भर बनाने में लगी थी। और उधर कांग्रेस के एमएलए आत्मनिर्भर होकर कमलनाथ को अनाथ कर दिये। इधर प्रियंका गांधी यूपी में कांग्रेस को आत्मनिर्भर बनाने में लगी थी, उधर गहलौत के कांग्रेसी विधायक, आत्मनिर्भर होकर लहालोट हो गए। इधर ज्योतिरानन्द, आत्मनिर्भरता का आनन्द ले रहे हैं। उधर पायलट, झट-पट आत्मनिर्भर होना चाहते हैं।

जब से हमारे आर्यावर्त के प्रधानमंत्री जी ने देश को सम्बोधित करते हुए आत्मनिर्भरता का मंत्र दिया है, तब से सबसे ज्यादा आत्मनिर्भर अगर कोई हुआ है तो वो है मीडिया। वह इतनी आत्मनिर्भर हो गई है कि अब वो जनता से जुड़ी ख़बरों और मुद्दों के सहारे नहीं रहती। बल्कि  खुद की फेक खबरे बनाती है, और फिर उसका रियल्टी चेक करके काम चला लेती है। मनचाही खबरें गढ़ लेती है। समस्या चीन की हो, तो बहस मंदिर पर कर लेती है। समस्या शिक्षा-रोजगार की हो तो पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक कर देती है। समस्या कानून व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवा का हो तो, तीन तलाक पर बहस कर लेती है। किसानों की आत्महत्या का मुद्दा हो तो, लव-जेहाद पर बहस कर लेती है। मतलब, जनता के सरोकारों से पूरी तरह आजाद, आत्मनिर्भर हो गयी है।

आत्मनिर्भरता के महामंत्र के बाद ओला-उबर-स्वीगी-जोमैटो से लेकर बड़ी-बड़ी आईटी कंपनियों से लेकर एमएसई और स्टार्टअप कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को निकालकर उन्हें और खुद को आत्मनिर्भर बनाने का मौका दिया है। एयर इंडिया और गो एयर अपने कर्मचारियों को बिना तनख्वाह के घर बिठाकर आत्मनिर्भर बनने की ट्रेनिंग दे रहे हैं। नौकरी गँवाने वाले आपस में इतने आत्मनिर्भर हैं की किसी को किसी की जरूरत ही नहीं। कोई किसी के लिए नहीं बोलता। एयर इंडिया-गो एयर वाले, जेट वालों, किंगफिशर वालों या रेलवे वालों के लिए नहीं बोले थे, वो बैंक वालों के लिए नहीं बोले, बैंक वाले बीएसएनएल वालों के लिए नहीं बोले।  इस तरह सब बारी-बारी आत्मनिर्भर हो रहे हैं।   

जनता और नेता हमेशा से ही आत्मनिर्भर रहे हैं। जनता कभी नेताओं पर निर्भर नहीं रहती है, खुद मर-खप कर टैक्स भरके नेताओं को एश करवाती है। बदले में अपने चहेते नेताओं से कभी कोई सवाल नहीं करती। अपने सड़क-बिजली-पानी के मुद्दों पर वोट नहीं देती बल्कि इन सब मुद्दों से पूर्णत: आत्मनिर्भर होकर, जाति और धर्म के नाम पर वोट दे देती है। और जीतने के बाद नेता भी जनता से कटकर, आत्मनिर्भर बन जाते हैं। यहाँ तक कि दुबारा वह वोट देनेवाली जनता को ही बदलकर पूर्ण आत्मनिर्भर बन जाते हैं। हाँ, अगर जनता इतनी आत्मनिर्भर हो जाए कि उसे सरकार या नेताओं कि जरूरत ही ना पड़े तो बात अलग है। 

सब अपने-अपने तरीके से आत्मनिर्भर हो रहे हैं। सरकार खुद आत्मनिर्भर होने के लिए, विदेशों से पूंजी निवेश माँग रही है। विश्व बैंक से कर्ज लेकर, अमेरिका-जापान से टेक्नालोजी लेकर, चीनी कम्पनी को ठेका देकर, आत्म निर्भर बन रही है। रक्षा-उद्योग में 100% विदेशी निवेश (एफ़डीआई) करके, फ्रान्स-अमेरिका-रूस से हथियार और उसकी ट्रेनिंग लेकर सुरक्षा में आत्मनिर्भर हो रही है। जनता, हर महीने सरकार से पाँच किलो गेंहू-चना लेकर, आत्मनिर्भर बन रही है।

देश के बैंक एनपीए करने में और दिवालिया होने में पूर्णत: आत्मनिर्भर हो गए हैं। छात्रों के कैरियर खराब करने में देश के विश्वविद्यालय और संस्थायें कई सालों से आत्मनिर्भर हो गए हैं। कानून व्यवस्था अब कानून पर बिल्कुल निर्भर नहीं रही, पूर्णत: आत्मनिर्भर हो गई है। गुण्डे अब इतने आत्मनिर्भर हो गए हैं कि पुलिस का भी एनकाउंटर कर दे रहे हैं। सबके सब आत्मनिर्भर हो गए हैं, अब आप भी आत्मनिर्भर होकर सोचिए, कब तक व्हाट्सअप्प यूनिवर्सिटी के भरोसे रहेंगे?

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Comment

आपकी राय

Wha kya baat hain.

एकदम झन्नाटेदार थप्पड़ की तरह रसीद किया है भाई आपने ये जागरूकता चरस भरा व्यंग्यात्मक लेख। उम्मीद है कि hard-core चरसीयों पर भी भारी पड़े आपका ये जागरूक करने वाला चरस।

आप का व्यंग्य बहुत अच्छा है ,एक चुटकी चरस का असर बहुत है।

Jara saa vyngy roopi charas bhii chakh lenaa chahiye .Dil khush ho jaataa hai.bahut khoob kaha......

सटीक व्यंग्य। फ़िल्म में किसी महा पुरूष या स्त्री का किरदार निभाकर क्या वास्तविक जीवन में भी वैसा होने का दावा कर सकता/सकती है। इसके नकारात्मक पहलू को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता । डायन/ चुड़ैल/ वेश्या / चोर/ डकैत/ बलात्कारी का किरदार निभाने वालों के बारे में केवल कल्पना करें तो...

Bahut khub sir

वास्तविकता यही है। सम्मान की भावना नहीं है कहीं भी।

Waw that's so funny but to the point

Ati uttam sir

उचित कहा, यह हमारी विडंबना है कि हमें हिन्दी पखवाड़ा मनाना पड़ता है |

बहुत सुंदर प्रस्तुति। वास्तव में ये बड़ी विपरीत धारणा हमारे देश मे है कि हिन्दी भाषी लोग पिछड़े होते है शायद इसी कारण अंग्रेजी में बात करना लोग अपनी शान और अग्रिम पंक्ति में बने रहना मानते है। आपको बहुत बधाई। आगे भी आपकी व्यग्य यात्रा और विकसित स्तर पर पहुचे। शुभकामनाये

नारायण सिंह जी, प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद। आपने बहुत सही बात की तरफ ध्यान खींचा है। विधवा के सिर से बिन्दी, की तरफ। ये 9 साल पुराना व्यंग्य है जैसा कि आप तारीख देख रहे होंगे। आगे इस तरह की बातों का ध्यान रखूंगा। दूसरी बात कि भाषण ज्यादा अंग्रेजी में हो गया, यही तो व्यंग्य है।
आपका बहुत आभार।

अतिसुन्दर रचना सर,,,मातृभाषा होते हुए भी बहुत से लोग इंग्लिश बोलना अपनी शान समझते हैं चाहे वो टूटी फूटी इंग्लिश ही क्यो ना बोले।

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आईने के सामने (काव्य संग्रह) का विमोचन 2014

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चिकोटी (ब्यंग्य संग्रह) का विमोचन 2012

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