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मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

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Blog posts : "ब्यंग्य "

बीते का मलाल! मुबारक नया साल !!

आखिरकार एक और साल ने भी जनता से विदा ले ही लिया। नए साल में कुछ नया हो या ना हो, कुछ बदले या ना बदले, हम भारत के लोग कसम खाते हैं कि कैलेंडर जरूर बदल देंगे। हमारे लिए तो यही बदलाव “आप” के बदलाव से, लोकपाल के बदलाव से, बड़ा है। वैसे कैलेण्डर बदलना, देश बदलने से कठिन काम है। इस चिलचिलाती ठण्ड में कटरीन…

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इमला लिख!

अगर मगर मत कर। बकर बकर कर। इधर उधर देख। देश का चुनाव है। जनता का जमाव है। जातियों का प्रभाव है। आयोग का दबाव है। दबाव सह। जनप्रिय कुछ कह। मंच पर चढ़। भाषण पढ़। आरोप मढ़। आगे बढ़। भावना पढ़। कर इमोशनल चोट। मिलेगा वोट। क्या है खोट। बिछाले गोट। दादी को मत भूल। पापा को चढ़ा फूल। कर जतन। फेंकूँ बन। पप्पू मत बन…

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तलाश एक मुद्दे की !!

      शादी के लिये घोड़ी की, कील के लिये हथोड़ी की, टिकट के लिये सिफारिश की, फसल के लिये बारिश की, रज़ाई के साथ गद्दे की जितनी जरूरत होती है, उतनी जरूरत चुनाव जीतने के लिये  मुद्दे की होती है। तो आजकल सभी नेताओ को एक अदद मुद्दे की तलाश है। क्योंकि सभी को सत्ता की प्यास है। किसी को मंदिर की, तो किसी को …

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तारीख पे तारीख..

ज्यों ज्यों नजदीक आ रहा है चुनाव। जनता का बढ़ रहा है भाव। पाँच साल तक नेता जी दिखा रहे थे ताव। अब जनता के मुँह में भी जबान आ गयी, घोषित होते ही चुनाव। चुनाव की सरगर्मी में, टीवी चैनल –अख़बार कर रहे हैं कांव-कांव। जनता की राय जानने, दौड़ रहे हैं गाँव-गाँव। जगह जगह चुनाव सभाओं के मंच सज रहे हैं। एक से एक…

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यत्र उलूकस्य पूज्यन्ते..... ....

बाबा शेक्सपियर ने कहा था कि हर कुत्ते का एक दिन आता है। तो आजकल कुत्तों के दिन चल रहे हैं। हालांकि उन्होने यह नहीं बताया था कि रात किसकी है या रात किसकी आएगी? तो मै आपको बताता हूँ कि आजकल उल्लुओं कि रात के साथ साथ दिन भी चल रहे हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कुत्तों की वैलू कम हो गयी है।…

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खोदने की कला !!

हमारे देश में खोदने और खुदवाने की बहुत ही विकसित परम्परा रही है। विभीषण ने रावण की जड़ खोदकर राम से उसका संहार करवाया। तो मंथरा ने कैकेयी रानी को खोद-खोदकर वरदान की याद दिलाई और राम को वन भेजवाया। पहले राजा महाराजा कुएं खुदवाया करते थे, तो आजकल अपराधी लोग जेल खोदकर फुर्र हो जाते हैं। लेकिन खोदने और ख…

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सोना पे सपना औ सपने में सोना ।

बड़े बुजुर्ग कहते थे कि सपने हमेशा सोने पर आते हैं। मगर आजकल की बात ही अलग है। आखिर कलयुग चल रहा है, इसलिए आजकल के संतों को सपने में सोना दिखाई दे रहा है। सोने पे सपना और सपने में सोना। वाह क्या जुगलबंदी है। आजकल एक संत शोभन सरकार को सपना आया है कि यूपी के उन्नाव के डौडिया खेड़ा गाँव में राजा राव राम …

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घोटाला गारंटी योजना .......

सरकार इधर बहुतई परेशान है। कारण है ई मुई कैग और सीबीआई। इनसे बचे तो, पब्लिक का पी आई एल । उसके बाद कोर्ट का डंडा। कोई सरकार को चैन से बैठने नहीं देता। एसे मेँ सरकार देश का विकास कैसे करे? देश विकास कर रहा है तो कुछ अज्ञानी चिल्ला रहे हैं कि घोटाला हो रहा है। अरे भाई ये भी तो देखो, पहले देश कितना गरी…

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निंदा है, तो जिंदा है...

       निन्दा रस का मजा सोमरस से भी ज्यादा आता है। यह एक सर्व सुलभ, सर्व ब्यापी, महंगाई से परे, सर्व ग्राही चीज है। निन्दा का आविष्कार हमारे देश में कब हुआ, यह तो परम निंदनीय ब्यक्ति ही बता सकता है। लेकिन आजकल इसका प्रयोग हमारे परम आदरणीय लोग खूब कर रहे हैं।…

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खाना खाये पब्लिक हमारो....

आजकल हमारे नेता एक से बढ़कर एक सनसनीखेज रहस्योद्घाटन करने में लगे हुये हैं। एक ने कहा, पब्लिक 5 रुपये में खाना खा सकती है। दूसरे ने कहा- पब्लिक 12 रुपये में खा सकती है। उसके बाद एक-एक कर बहुत से नेताओं ने अलग-अलग खाने के रेट का खुलासा किया। तब जाकर मुझ जैसे अज्ञानी को ये पता चला की पब्लिक खाना भी ख…

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गिरो, मगर प्यार से....

देश आजकल गिरने में ओलंपिक पदक जीतने की होड़ में लगा है। हमारे देश का हर तबका गिरने में चैम्पियन बनना चाहता है। सभी गिरने में एक दूसरे से होड़ ले रहे हैं। वैसे गिरे तो प्रिंस थे। वो भी गड्ढे में। जिसके लिए टीवी से लेकर अख़बार वाले तक दिन रात एक कर दिये थे। तब पहली बार मुझे भी गिरने के महत्व का पता चला थ…

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जिम्मेदार की तलाश !

आजकल देश के सामने सबसे बड़ी समस्या आन पड़ी है, जिम्मेदार आदमी ढूँढने की। इस वजह से सबसे ज्यादा परेशानी अगर किसी को हो रही है, तो वे हैं, हमारे खबरिया चैनल। सभी को तलाश है एक जिम्मेदार आदमी की। क्योंकि समस्या है तो मुद्दा है। मुद्दा है तो खबर है। खबर है तो खबरिया चैनल हैं। अब समस्या की वजह से ही तो चैन…

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देशहित-जनहित में निजहित !!

देशहित की बीमारी जिसे लग जाए, उसे नेता बनाकर ही छोड़ती है। अगर कोढ़ में खाज की तरह, देशहित के साथ साथ जनहित का रोग भी जिसे लग जाए, वह तो मंत्री या प्रधान मंत्री तक बन सकता है। इतिहास गवाह है की हर नेता की उत्पत्ति इन्हीं दो कारणों से हुई है। देशहित या जनहित। अब हमारा देश ठहरा अनपढ़-गंवार। देश की जनता भ…

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ना काहू का भांजा, ना काहू का दामाद !!

महाभारत काल से लेकर आधुनिक कलयुग तक, कंस व शकुनी मामाओं ने भांजों का जितना विनाश किया था, उन सबका बदला कलयुगी भांजे ने ले लिया। और मामा के रेल में एसा खेल खेला, कि रेल तो पटरी से उतरी ही, मामा भी कुर्सी से उतर गया। अब तक लोग कहते थे, कि पुत्र, कुपुत्र हो सकता है, लेकिन कोई यह नहीं कहता था कि भांजा, …

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हर सौदे में परसेंटेज, जरूरी होता है........

चाय के लिए जैसे टोस्ट होता है, वैसे हर सौदे में परसेंटेज, जरूरी होता है। कोई तोप की दलाली में, पैसे खाये। कोई कोयले की खान को, लूट ले जाए। कोई कामन वेल्थ …

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वाग्वीर इंसान की, होत चीकनी बात !!

हमारा देश वाग्वीरों का देश है। हमारे देश में एक से बढ़कर एक वाग्वीर मौजूद हैं। सभी अपनी बातों से ही दुनिया फतह करते रहते हैं। इनके पास अत्याधुनिक ‘बयान बम’ पाये जाते हैं, जिसे वे हर अवसर पर फोड़ते रहते हैं। अपने बयान बमों की शक्ति बढ़ाने के लिए, हमारे वाग्वीर, उसमें ‘चैनल चर्चा’ के छर्रे मिलाते हैं, जि…

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तरक्की हो रही है...

हमारा देश तरक्की की चक्की में, पिस रहा है। देश का विकास, आम आदमी को उदास कर रहा है। अब तो आम भी इतने महंगे होते जा रहे हैं कि कुछ दिन बाद लोग‘आम’आदमी होना भी अफोर्ड नहीं कर पायेंगे। जो आदमी मिलेंगे, वो बिना‘आम’ वाले आदमी होंगें। रोड के एक तरफ बड़े बड़े माल। तो दूसरी तरफ कटोरा पकड़े कंगाल। एक तरफ सरकार …

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बनन में, बागन में, ... वेलेंटाइन !

ज्यों ज्यों वेलेंटाइन डे नजदीक आता है, नवयुवकों और नवयुवतियों की बांछे (वो शरीर में जहाँ भी पायी जाती हों) खिल जाती हैं। वैसे भी बसंत और फागुन का हमारे पूर्वजों ने भी बहुत नाजायज फायदा उठाया है। कभी पद्माकर जी ने बसंत के बारे में कहा था कि- “बीथिन में, ब्रज में, नेबोलिन में, बोलिन में, बनन में, बागन…

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जांच अभी जारी है .......

जांच एक एसी प्रक्रिया है, जिससे दोषी पर कभी आंच नहीं आती। अफसर-नेता, घोटाले का करें नंगा नांच। जब जनता चिल्लाये, तो थमा देते हैं, जांच। और किसी दोषी पर कभी नहीं आती आंच। ये है पब्लिक उवाच। …

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सेवा का मेवा .....

यूं तो हमारे सेवक राम जी में बचपन से ही समाज सेवा का कीड़ा कुलबुलाता था। लेकिन ज्यों ज्यों वह बड़े होते गए, समाज सेवा का कीड़ा भी बड़ा होता गया। छोटे थे तो लोगों से हजार दो हजार झटक कर उन्हें मोह माया के चंगुल से मुक्ति देते थे। थोड़ा बड़े हुये तो सरकारी चीजों को अपना समझकर अपनाते रहे। कभी सरकारी जमी…

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20 Blog Posts

आपकी राय

Very nice Sir, you always highlight important point of the country.

भाई रावण कब तक जलाएंगे लाखों खुले आम घूम रहे हैं उनका क्या होगा और कब होगा??

Wha kya baat hain.

एकदम झन्नाटेदार थप्पड़ की तरह रसीद किया है भाई आपने ये जागरूकता चरस भरा व्यंग्यात्मक लेख। उम्मीद है कि hard-core चरसीयों पर भी भारी पड़े आपका ये जागरूक करने वाला चरस।

आप का व्यंग्य बहुत अच्छा है ,एक चुटकी चरस का असर बहुत है।

Jara saa vyngy roopi charas bhii chakh lenaa chahiye .Dil khush ho jaataa hai.bahut khoob kaha......

सटीक व्यंग्य। फ़िल्म में किसी महा पुरूष या स्त्री का किरदार निभाकर क्या वास्तविक जीवन में भी वैसा होने का दावा कर सकता/सकती है। इसके नकारात्मक पहलू को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता । डायन/ चुड़ैल/ वेश्या / चोर/ डकैत/ बलात्कारी का किरदार निभाने वालों के बारे में केवल कल्पना करें तो...

Bahut khub sir

वास्तविकता यही है। सम्मान की भावना नहीं है कहीं भी।

Waw that's so funny but to the point

Ati uttam sir

उचित कहा, यह हमारी विडंबना है कि हमें हिन्दी पखवाड़ा मनाना पड़ता है |

बहुत सुंदर प्रस्तुति। वास्तव में ये बड़ी विपरीत धारणा हमारे देश मे है कि हिन्दी भाषी लोग पिछड़े होते है शायद इसी कारण अंग्रेजी में बात करना लोग अपनी शान और अग्रिम पंक्ति में बने रहना मानते है। आपको बहुत बधाई। आगे भी आपकी व्यग्य यात्रा और विकसित स्तर पर पहुचे। शुभकामनाये

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आईने के सामने (काव्य संग्रह) का विमोचन 2014

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चिकोटी (ब्यंग्य संग्रह) का विमोचन 2012

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अन्यत्र

आदरणीय  कुशवाहा जी प्रणाम। कमेन्ट के लिए धन्यवाद ।
मनोज जी, अत्यंत सुंदर व्यंग्य रचना। शायद सत्ताधारियों के लिए भी जनता अब केवल हंसी-मजाक विषय रह गई है. जब चाहो उसका मजाक उड़ाओ और उसी के नाम पर खाओ&...
कुछ न कुछ तो कहना ही पड़ेगा , जानी साहब. कब तक बहरे बन कर बैठे रहेंगे. कब तक अपने जज्बातों को मरते हुए देखेंगे. आखिर कब तक. देश के हालात को व्यक्त क...
स्नेही जानी जी , सादर ,बहुत सुन्दर भाव से पूर्ण कविता ,आज की सच्चाई को निरुपित करती हुई . सफल प्रस्तुति हेतु बधाई .
तरस रहे हैं जो खुद, मय के एक कतरे को, एसे शाकी हमें, आखिर शराब क्या देंगे? श्री मनोज कुमार जी , नमस्कार ! क्या बात है ! आपने आदरणीय डॉ . बाली से...