Menu

मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

header photo

कैसी लगी रचना आपको ? जरूर बताइये ।

There are currently no blog comments.

गिरो, मगर प्यार से....

देश आजकल गिरने में ओलंपिक पदक जीतने की होड़ में लगा है। हमारे देश का हर तबका गिरने में चैम्पियन बनना चाहता है। सभी गिरने में एक दूसरे से होड़ ले रहे हैं। वैसे गिरे तो प्रिंस थे। वो भी गड्ढे में। जिसके लिए टीवी से लेकर अख़बार वाले तक दिन रात एक कर दिये थे। तब पहली बार मुझे भी गिरने के महत्व का पता चला था।

जब लोगों को गिरने के महत्व का पता नहीं था, तब भी लोग उतने ही चाव से गिरते थे, जितने की आज गिर रहे हैं। मोहतरमा लैला के प्यार में बेचारे मजनूँ एसे गिरे थे कि आजतक लोग उनके गिरने की मिशाल देते हैं। हालांकि जवानी में प्यार में गिरना आम-बात है। राहत इंदौरी जी ने फरमाया है कि- जवानियों में, जवानी को धूल करते हैं। जो लोग भूल नहीं करते, भूल करते हैं।

हमारे यहाँ गिरने को बहुत ही शायराना अंदाज में सलाम किया जाता है। किसी शायर ने गिरने के महत्व पर इस तरह रोशनी डाली है कि- गिरते हैं शह-सवार ही, मैदाने जंग में। वो तिफ्ल क्या गिरेंगे, जो घुटनों के बल चलें। यानि कि गिरना हमारे देश में जिंदादिली की निशानी है। जो जितना गिरता है, या जितना गिरा हुआ होता है, उतना ही बड़ा शह-सवार या लड़ाकू वीर होता है।

वैसे लड़ाई में भले कुछ ही लोग गिरें, लेकिन भारतीय जनता, तो रोज ही गिरती रहती है। क्योंकि हमारी सरकारों ने सड़कें ही इतनी गड्ढेदार बनाई हैं, कि साईकिल और मोटरसाइकिल सवार तो अपने को शह-सवार ही समझता है, और कार वाले को तिफ्ल, जो गड्ढों में गिर तो नहीं सकते, लेकिन सीट बेल्ट बाँधकर गड्ढों में सोना-बेल्ट से तेज पेट कि चर्बी घटा सकते हैं।

हालांकि केवल जनता ही नहीं गिरती है। कभी-कभी तो कुछ चीजें, खुद जनता पर गिर जाती हैं। जैसे महँगाई की बिजली तो जनता पर गिरती ही रहती है। वैसे बिजली तो हुस्न की भी गिरती है। लेकिन उस बिजली को तो सभी अपने ऊपर गिराना चाहते हैं। लेकिन लोग महँगाई-भ्रष्टाचार की बिजली गिरने से ज्यादा परेशान होते हैं। वैसे पाँच साल बाद चुनाव भी जनता पर गिरते ही रहते हैं।

वैसे हमारे देश की जनता ही नहीं, उसके नुमाइन्दे भी कम गिरे हुये नहीं होते। लोगों का तो यह मानना है कि नेता लोग गिरने और गिराने में माहिर होते हैं। कभी सरकार गिरा देते हैं, कभी टूजी-कोयले में खुद गिर पड़ते हैं। हालांकि गिरी हुई सरकार को उठाने के लिए तो सीबीआई है। लेकिन जनता को तो केवल भगवान के ही उठाने का सहारा है।

इधर आजकल कुछ निर्जीव चीजें भी बहुत गिरने लगी हैं। आजकल बड़े-बड़े लोग जिसके गिरने से परेशान हैं, वो है रुपया। अरे आप ये ना समझिए कि रुपया गिर रहा है और उठाना है। वैसे गिरते हुये रुपये को उठाने के लिए कभी-कभी खुद भी गिरना पड़ता है। यहाँ तो रुपये कि कीमत गिर रही है, वो भी डालर के मुकाबले। और जब गिर रही है तो क्या खूब गिर रही है। देखने वालों को शह-सवार के गिरने वाल सीन याद आ रहा है। कहाँ तो इण्डिया शाइनिंग और देश तरक्की की चौकड़ी भर रहा था, कहाँ रुपया धड़ाम हो गया। सरकार को तो सीबीआई सहारा दे देती है, लेकिन रुपये को आरबीआई भी नहीं संभाल पा रही है। इसलिए रूपय्या महारानी से निवेदन यही है कि गिरो, मगर प्यार से....  क्योकि तुम चाहे जितना गिर जाओ, उतना नहीं गिर सकती, जितना तुम्हारे लिए इन्सान गिर सकता है। 

Go Back

Comment

450;460;9cbd98aa6de746078e88d5e1f5710e9869c4f0bc450;460;fe332a72b1b6977a1e793512705a1d337811f0c7450;460;0d7f35b92071fc21458352ab08d55de5746531f9450;460;1b829655f614f3477e3f1b31d4a0a0aeda9b60a7450;460;f702a57987d2703f36c19337ab5d4f85ef669a6c450;460;cb4ea59cca920f73886f27e5f6175cf9099a8659450;460;427a1b1844a446301fe570378039629456569db9450;460;dc09453adaf94a231d63b53fb595663f60a40ea6450;460;f8dbb37cec00a202ae0f7f571f35ee212e845e39450;460;69ba214dba0ee05d3bb3456eb511fab4d459f801450;460;6b3b0d2a9b5fdc3dc08dcf3057128cb798e69dd9450;460;7bdba1a6e54914e7e1367fd58ca4511352dab279450;460;946fecccc8f6992688f7ecf7f97ebcd21f308afc450;460;d0002352e5af17f6e01cfc5b63b0b085d8a9e723450;460;60c0dbc42c3bec9a638f951c8b795ffc0751cdee450;460;7329d62233309fc3aa69876055d016685139605c

आईने के सामने (काव्य संग्रह) का विमोचन 2014

400;300;dc90fda853774a1078bdf9b9cc5acb3002b00b19400;300;611444ac8359695252891aff0a15880f30674cdc400;300;a5615f32ff9790f710137288b2ecfa58bb81b24d400;300;7a24b22749de7da3bb9e595a1e17db4b356a99cc400;300;f7d05233306fc9ec810110bfd384a56e64403d8f400;300;f4a4682e1e6fd79a0a4bdc32e1d04159aee78dc9400;300;dde2b52176792910e721f57b8e591681b8dd101a400;300;bbefc5f3241c3f4c0d7a468c054be9bcc459e09d400;300;b6bcafa52974df5162d990b0e6640717e0790a1e400;300;ba0700cddc4b8a14d184453c7732b73120a342c5400;300;02765181d08ca099f0a189308d9dd3245847f57b400;300;f5c091ea51a300c0594499562b18105e6b737f54400;300;52a31b38c18fc9c4867f72e99680cda0d3c90ba1400;300;7b8b984761538dd807ae811b0c61e7c43c22a972400;300;9180d9868e8d7a988e597dcbea11eec0abb2732c400;300;e167fe8aece699e7f9bb586dc0d0cd5a2ab84bd9

हमसे संपर्क करें

visitor

271201

चिकोटी (ब्यंग्य संग्रह) का विमोचन 2012

400;300;6600ea27875c26a4e5a17b3943eefb92cabfdfc2400;300;acc334b58ce5ddbe27892e1ea5a56e2e1cf3fd7b400;300;639c67cfe256021f3b8ed1f1ce292980cd5c4dfb400;300;1c995df2006941885bfadf3498bb6672e5c16bbf400;300;f79fd0037dbf643e9418eb6109922fe322768647400;300;d94f122e139211ea9777f323929d9154ad48c8b1400;300;4020022abb2db86100d4eeadf90049249a81a2c0400;300;f9da0526e6526f55f6322b887a05734d74b18e66400;300;9af69a9bc5663ccf5665c289fc1f52ae6c1881f7400;300;e951b2db2cbcafdda64998d2d48d677073c32c28400;300;903118351f39b8f9b420f4e9efdba1cf211f99cf400;300;5c086d13c923ec8206b0950f70ab117fd631768d400;300;71dca355906561389c796eae4e8dd109c6c5df29400;300;b0db18a4f224095594a4d66be34aeaadfca9afb3400;300;dfec8cfba79fdc98dc30515e00493e623ab5ae6e400;300;31f9ea6b78bdf1642617fe95864526994533bbd2

अन्यत्र

आदरणीय  कुशवाहा जी प्रणाम। कमेन्ट के लिए धन्यवाद ।
मनोज जी, अत्यंत सुंदर व्यंग्य रचना। शायद सत्ताधारियों के लिए भी जनता अब केवल हंसी-मजाक विषय रह गई है. जब चाहो उसका मजाक उड़ाओ और उसी के नाम पर खाओ&...
कुछ न कुछ तो कहना ही पड़ेगा , जानी साहब. कब तक बहरे बन कर बैठे रहेंगे. कब तक अपने जज्बातों को मरते हुए देखेंगे. आखिर कब तक. देश के हालात को व्यक्त क...
स्नेही जानी जी , सादर ,बहुत सुन्दर भाव से पूर्ण कविता ,आज की सच्चाई को निरुपित करती हुई . सफल प्रस्तुति हेतु बधाई .
तरस रहे हैं जो खुद, मय के एक कतरे को, एसे शाकी हमें, आखिर शराब क्या देंगे? श्री मनोज कुमार जी , नमस्कार ! क्या बात है ! आपने आदरणीय डॉ . बाली से...