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मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

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भीड़ की चिंता !! (व्यंग्य)

हमारे बुद्धिजीवी चिंतक जी परेशान हैं। न्यूज चैनलों के एंकर हलकान हैं। जिसे देखो चिंतित है। आखिर बात ही एसी है। अन्ना जी के आंदोलन में भीड़ नहीं आई। टीवी चैनलों पर स्वानाम धन्य बुद्धिजीवी देश की सबसे बड़ी समस्या पर ब्रेन स्टार्मिंग कर रहे है। समस्या ही इतनी विकराल है। आखिर अन्ना जी के आंदोलन में भीड़ नहीं आई। पहली बार पता चला की टीवी वाले लोकपाल या अन्ना के लिए कवरेज नहीं करते हैं, भीड़ के लिए करते हैं।

अब समस्या ही इतनी विकराल है कि, मैंने सोचा मैं भी बहती गंगा में हाथ धोकर यानि कि भीड़ की चिंता करके देश के बड़े बुद्धजीवियों में शुमार हो जाऊँ। हाँ, तो मुख्य  समस्या पर बात करते हैं। अन्ना जी के अनशन में भीड़ नहीं आई। मुझे लगता है कि आज हमारे देश कि मुख्य समस्या अन्ना जी के अनशन में भीड़ का ना आना है, ना कि भ्रष्टाचार की, जैसा कि अन्ना जी कह रहे हैं। जब उनको सुनने भीड़ ही नहीं आयी तो हम क्यों सुनें?

वैसे भी हमारे देश में, भ्रष्टाचार कभी मुद्दा था ही नहीं। वो तो चैनल वाले कभी कभार टेस्ट बदलने के लिए भ्रष्टाचार की सिर्फ चर्चा कर लेते थे। असल मुद्दा तो भीड़ ही है। भीड़ आज हमारे देश की राष्ट्रीय समस्या हो गयी है। भ्रष्टाचार से भी बड़ी। सभी लोग इसी चिंता में दुबले हो रहे हैं कि भीड़ नहीं आयी। एसा लगता है कि हमारा लोकतंत्र आज भीड़ तंत्र हो गया है। इसीलिए तो भीड़ कि जरूरत, अन्ना से ज्यादा, चिंतकों को है।

आखिर भीड़ की चाहत सभी को होती है, चाहे वह नेता हो या अभिनेता। बाबा हो या अवतारी। बिना भीड़ के उनकी शक्ति प्रदर्शित नहीं हो पाती। लोगों का क्या है? लोग तो बहुत तरह के होते हैं। कुछ लोग भीड़ खींचू टाइप के होते है। जिनका प्रयोग प्राय: चुनावों के दौरान नेता लोग करते हैं। ये लोग सभाओं में, धरना-प्रदर्शनों में, हड़तालों आदि में भीड़ खींचने के काम आते हैं। नेताओं के लिए अभिनेता, बहुधा भीड़ खींचू के रूप में प्रयुक्त होते हैं।

तो आजकल सभी विद्वानों को, टीवी चैनलों को चिंता है कि अन्ना के अनशन में भीड़ नहीं आई। अब बिना भीड़ के देश का भला हो सकता है क्या? जब 1984 में भीड़ सड़कों पर आई तो सिक्खों का कत्लेआम किया। 1992 में भीड़ इकट्ठा हुई तो बाबरी मस्जिद तोड़ दी और मुंबई में दंगे हुये। 2002 में गुजरात का भीड़काण्ड अभी तक सबको याद है। अभी हाल ही में भीड़ ने कैसे एक युवती को नोचा-खसोटा, इसे सारे टीवी चैनलों ने दिखाया। अगर भीड़ ना आती तो क्या एसे बड़े-बड़े काम हो पाते? नहीं ना! इसीलिए तो सभी आंदोलन से ज्यादा, भीड़ की चिंता कर रहे हैं।

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आईने के सामने (काव्य संग्रह) का विमोचन 2014

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चिकोटी (ब्यंग्य संग्रह) का विमोचन 2012

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