Menu

मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

header photo

कैसी लगी रचना आपको ? जरूर बताइये ।

There are currently no blog comments.

बागी नेता का इंटरव्यू

जैसा कि आप सभी जानते ही हैं, कि मैं भी अपने मुहल्ले का वर्ल्ड-फेमस पत्रकार हूँ, तो कभी-कभी मेरे अंदर का पत्रकारी कीड़ा कुलबुलाने लगता है। इसलिए कभी-कभार लोगों के छोटे-मोटे इंटरव्यू कर लेता हूँ। तो पेश है कई बागी नेताओं के इंटरव्यू के कुछ अंश। ये इंटरव्यू अलग-अलग नेताओं से अलग-अलग मौकों पर लिए गए हैं। इसे नेताओं की निजी राय समझा जाए। इन विचारों से पत्रकार का कोई लेना-देना नहीं है। और पत्रकार तथा जनता का इससे सहमत होना कतई जरूरी नहीं है। इंटरव्यू का किसी भी भारतीय नेता से कोई सम्बन्ध नहीं है, और इसका किसी भी नेता के इंटरव्यू से समानता, संयोग मात्र है।  

पहला इंटरव्यू श्री जनसेवक जी का है, जिन्होने चुनाव से पहले अपनी पार्टी छोड़कर बागी होकर दूसरी पार्टी में शामिल हो गए:

प्रश्न: जनसेवक जी, अभी आप दूसरी पार्टी में क्यों शामिल हो रहे हैं? क्या इसलिए कि सर्वेक्षणों में आपकी वर्तमान पार्टी हारती हुई दिखाई जा रही है?

ज॰से॰जी: देखिए मैं एक जनता का सेवक हूँ। अब तक मैं जिस पार्टी में था, उसमें बिलकुल भी लोकतंत्र नहीं है। पार्टी अपने मुद्दों से भटक गयी है। कुछ लोग पार्टी पर हावी हो गए है। कार्यकर्ताओं कि पार्टी में कोई सुनवाई नहीं होती। सारे फैसले एक ही ब्यक्ति और परिवार लेता है। जनता के लिए इस पार्टी ने कुछ नहीं किया।

प्रश्न: तो आपने पाँच साल तक क्यों इंतजार किया? क्या आप अब इसलिए पार्टी छोड़ रहे हैं, क्योंकि आपको लगता है कि दूसरी पार्टी जीतने वाली है?

ज॰से॰जी: देखिए मैंने पूरी जिंदगी जनता कि सेवा की है। जनता आज महँगाई और भ्रष्टाचार से त्रस्त है और इस पार्टी ने कुछ नहीं किया, जनता के लिए। अब इस पार्टी में मेरा दम घुटता है। मैं जनता के लिए अपने प्राण दे सकता हूँ, यह पार्टी छोड़ना कौन सी बड़ी बात है।

प्रश्न: नेताजी आप पर आरोप है कि आप इसलिए पार्टी छोड़ रहे हैं क्योंकि आपकी पार्टी अगले चुनाव में आपको टिकट नहीं देने का फैसला कर चुकी है?

ज॰से॰जी: देखिए मैंने बहुत सालों तक जनता और इस पार्टी कि सेवा किया है। लेकिन आज पार्टी अपने सिद्धांतों से भटक गयी है। पार्टी में बहुत से दागी और बागी आज ऊँचे पदों पर आसीन हो गए हैं। जनता भूँख और भ्रष्टाचार से कराह रही है। इसलिए मैं ये पार्टी छोड़ रहा हूँ।

प्रश्न: नेताजी, पार्टी ने जनता के लिए कुछ नहीं किया, तो आपने क्या-क्या काम जनता के लिए पिछले पाँच सालों में किया?

ज॰से॰जी: देखिए पिछले पाँच साल क्या, मैंने तो अपना पूरा राजनैतिक जीवन ही जनता कि सेवा में लगा दिया। लेकिन इस पार्टी ने जनता की कोई सुध नहीं ली। जनता इनको सबक सिखाएगी। जनता सब समझती है।

प्रश्न: नेताजी, कोई भी एक काम आप गिना सकते हैं जो आपने इतने वर्षों में जनता के लिए किया हो?

ज॰से॰जी: देखिए मुझे जनता की सेवा में जाना है, मेरे पास अभी इन फालतू के सवालों के लिए कोई वक्त नहीं है। कहते हुये नेता जी आगे बढ़ गए।

दूसरा इंटरव्यू श्री देशभक्त जी का है, जिन्होने चुनाव के बाद अपनी पार्टी से बगावत करके, सरकार बनाने वाली पार्टी में शामिल हो गए।

प्रश्न: नेताजी, आप ने पार्टी क्यों छोड़ी? दे॰भ॰जी: देखिए मैंने जनता की सेवा के लिए यह पार्टी छोड़ी है। मैंने अपने पूरे राजनैतिक कैरियर में जनता के हित को हमेशा सर्वोपरि रखा। मेरे लिए जनता और देश पहले है, बाकी सब बाद में।

प्रश्न: नेताजी, चुनाव में आपने जिस पार्टी के खिलाफ लड़ा था, अब उसी में शामिल हो रहे हैं? पूरे चुनाव में जिस पार्टी की नीतियों और कामों की बुराई की, अब उसी में शामिल हो रहे हैं? एसा क्यों ?

दे॰भ॰जी: देखिए मैं इस पार्टी में मुद्दों के आधार पर आया था। जनता के मुद्दे मेरे लिए ज्यादा महत्वपूर्ण हैं, इसलिए मैं जनहित के लिए दूसरी पार्टी में जा रहा हूँ। हर पार्टी की अपनी नीतियाँ होती है, अब मुझे समझ में आ गया है कि वर्तमान पार्टी सिर्फ अपने लाभ के लिए काम करती है, जनता के लिए नहीं।

प्रश्न: तो आप दूसरी पार्टी में जनता के हित के लिए शामिल हो रहे हैं, या अपने हित के लिए? आप पर आरोप है कि आप मंत्री बनने के लिए दूसरी पार्टी में शामिल हो रहे हैं। आप का इस पर क्या कहना है?

दे॰भ॰जी: देखिए ये सब विरोधियों कि साजिश है, उनका प्रोपोगण्डा है। जनता सब समझती है। मैंने हमेशा जनता कि सेवा की है और मरते दम तक करता रहूँगा। अभी मेरे पास फालतू के सवालों के लिए वक्त नहीं है, मुझे जनता की सेवा में जाना है। कहते हुये देशभक्त जी उठकर चले गए।

तीसरा इंटरव्यू उस नेता का है, जो मंत्री ना बनने पर नाराज होकर पार्टी से बगावत कर बैठे।

प्रश्न: नेता जी, आप अपनी ही पार्टी के खिलाफ क्यों बोल रहे हैं? क्या आप को पार्टी ने मंत्री नहीं बनाया इसलिए?

नेताजी: देखिए मैं पद का लालची नहीं हूँ। मेरे लिए जनता और जनता के मुद्दे पहले आते हैं, पार्टी बाद में। पार्टी ने जनता से जो वादे किए थे वो पूरा नहीं कर रही है। पार्टी ने जनता को धोखा दिया है।

प्रश्न: लेकिन सरकार अभी-अभी तो बनी है। वादे पूरे करने के लिए तो पाँच साल है, आप अभी से पार्टी की बुराई क्यों करने लगे?

नेताजी: मैं जनता के मुद्दों के लिए पार्टी में शामिल हुआ था। लेकिन पार्टी ने सरकार बनाने के बाद अपने वादों को पूरा नहीं किया। पानी और बिजली फ्री देने की बात की थी, अब सरकार ने उसमें शर्तें लगा दी। यह तो जनता के साथ धोखा है।

प्रश्न: नेताजी। सरकार बने तो अभी कुछ ही दिन हुये हैं, सरकार अपने वादों को पूरा करने की दिशा में तो बढ़ रही है। आपको इतनी जल्दबाजी क्यों है? क्या पाँच साल के काम पाँच दिन में हो सकते हैं?

नेताजी: देखिए, हमारी सरकार मुद्दों से भटक गयी है। सरकार ने जनता से धोखा किया है। ना भ्रष्टाचार दूर हुआ, ना ही गरीबी-बेरोजगारी। सरकार जनता और जनता के मुद्दों से कट गयी है।

प्रश्न: तो फिर आप पार्टी को छोड़ क्यों नहीं देते? क्या आप पार्टी से इसलिए इस्तीफा नहीं दे रहे हैं कि इससे आपकी सदस्यता ख़त्म हो जाएगी?

नेताजी: मैंने पार्टी को मुद्दों के आधार पर ज्वाइन किया था। मैंने भी पार्टी को अपने खून-पसीने से सींचा है। मैं पार्टी क्यों छोडूँ? मेरे लिए जनता के मुद्दे आगे हैं, पार्टी पीछे।

प्रश्न: तो फिर आप एसी धोखेबाज़ सरकार के साथ क्यों हैं? क्या आपको चुनाव के समय वादों के बारे में सब कुछ नहीं पता था? क्या आपकी पार्टी की फ्री पानी-बिजली की शर्ते आपको नहीं पता थी? क्या आपने भी जनता से उन शर्तों को छुपाकर जनता से धोखा नहीं किया?

नेताजी: पार्टी अब ब्यक्ति आधारित हो गयी है। एक ही आदमी सभी नियम कायदे बनाता है और सबसे वही फालो करवाया जाता है। पार्टी के भीतर लोकतन्त्र नहीं है। किसी को अपनी बातें कहने का हक नहीं है। मैं जनता और उसके मुद्दों के लिए लड़ता रहूँगा। मुझे किसी पद का लालच नहीं है। मैं सेवा करने आया हूँ और सेवा करता रहूँगा।

प्रश्न: तो क्या आप इस्तीफा देकर जनता की सेवा नहीं कर सकते?

सवाल सुनकर नेताजी उठते हुये बोले, भाई मुझे जनता की सेवा में जाना है। मेरे पास वक्त नहीं है, फिर कभी आना। और नेताजी चल दिये। 

Go Back

Comment

450;460;7329d62233309fc3aa69876055d016685139605c450;460;d0002352e5af17f6e01cfc5b63b0b085d8a9e723450;460;fe332a72b1b6977a1e793512705a1d337811f0c7450;460;9cbd98aa6de746078e88d5e1f5710e9869c4f0bc450;460;7bdba1a6e54914e7e1367fd58ca4511352dab279450;460;427a1b1844a446301fe570378039629456569db9450;460;1b829655f614f3477e3f1b31d4a0a0aeda9b60a7450;460;f702a57987d2703f36c19337ab5d4f85ef669a6c450;460;f8dbb37cec00a202ae0f7f571f35ee212e845e39450;460;dc09453adaf94a231d63b53fb595663f60a40ea6450;460;69ba214dba0ee05d3bb3456eb511fab4d459f801450;460;0d7f35b92071fc21458352ab08d55de5746531f9450;460;cb4ea59cca920f73886f27e5f6175cf9099a8659450;460;946fecccc8f6992688f7ecf7f97ebcd21f308afc450;460;60c0dbc42c3bec9a638f951c8b795ffc0751cdee450;460;6b3b0d2a9b5fdc3dc08dcf3057128cb798e69dd9

आईने के सामने (काव्य संग्रह) का विमोचन 2014

400;300;f7d05233306fc9ec810110bfd384a56e64403d8f400;300;dc90fda853774a1078bdf9b9cc5acb3002b00b19400;300;b6bcafa52974df5162d990b0e6640717e0790a1e400;300;9180d9868e8d7a988e597dcbea11eec0abb2732c400;300;bbefc5f3241c3f4c0d7a468c054be9bcc459e09d400;300;7b8b984761538dd807ae811b0c61e7c43c22a972400;300;52a31b38c18fc9c4867f72e99680cda0d3c90ba1400;300;7a24b22749de7da3bb9e595a1e17db4b356a99cc400;300;f4a4682e1e6fd79a0a4bdc32e1d04159aee78dc9400;300;02765181d08ca099f0a189308d9dd3245847f57b400;300;dde2b52176792910e721f57b8e591681b8dd101a400;300;ba0700cddc4b8a14d184453c7732b73120a342c5400;300;611444ac8359695252891aff0a15880f30674cdc400;300;f5c091ea51a300c0594499562b18105e6b737f54400;300;e167fe8aece699e7f9bb586dc0d0cd5a2ab84bd9400;300;a5615f32ff9790f710137288b2ecfa58bb81b24d

हमसे संपर्क करें

visitor

270220

चिकोटी (ब्यंग्य संग्रह) का विमोचन 2012

400;300;6600ea27875c26a4e5a17b3943eefb92cabfdfc2400;300;acc334b58ce5ddbe27892e1ea5a56e2e1cf3fd7b400;300;639c67cfe256021f3b8ed1f1ce292980cd5c4dfb400;300;1c995df2006941885bfadf3498bb6672e5c16bbf400;300;f79fd0037dbf643e9418eb6109922fe322768647400;300;d94f122e139211ea9777f323929d9154ad48c8b1400;300;4020022abb2db86100d4eeadf90049249a81a2c0400;300;f9da0526e6526f55f6322b887a05734d74b18e66400;300;9af69a9bc5663ccf5665c289fc1f52ae6c1881f7400;300;e951b2db2cbcafdda64998d2d48d677073c32c28400;300;903118351f39b8f9b420f4e9efdba1cf211f99cf400;300;5c086d13c923ec8206b0950f70ab117fd631768d400;300;71dca355906561389c796eae4e8dd109c6c5df29400;300;b0db18a4f224095594a4d66be34aeaadfca9afb3400;300;dfec8cfba79fdc98dc30515e00493e623ab5ae6e400;300;31f9ea6b78bdf1642617fe95864526994533bbd2

अन्यत्र

आदरणीय  कुशवाहा जी प्रणाम। कमेन्ट के लिए धन्यवाद ।
मनोज जी, अत्यंत सुंदर व्यंग्य रचना। शायद सत्ताधारियों के लिए भी जनता अब केवल हंसी-मजाक विषय रह गई है. जब चाहो उसका मजाक उड़ाओ और उसी के नाम पर खाओ&...
कुछ न कुछ तो कहना ही पड़ेगा , जानी साहब. कब तक बहरे बन कर बैठे रहेंगे. कब तक अपने जज्बातों को मरते हुए देखेंगे. आखिर कब तक. देश के हालात को व्यक्त क...
स्नेही जानी जी , सादर ,बहुत सुन्दर भाव से पूर्ण कविता ,आज की सच्चाई को निरुपित करती हुई . सफल प्रस्तुति हेतु बधाई .
तरस रहे हैं जो खुद, मय के एक कतरे को, एसे शाकी हमें, आखिर शराब क्या देंगे? श्री मनोज कुमार जी , नमस्कार ! क्या बात है ! आपने आदरणीय डॉ . बाली से...