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मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

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बच्चे कितने अच्छे???

आजकल देश पर बहुत भारी बिपदा आन पड़ी है। पूरा देश और हिन्दू धर्म खतरे में पड़ गया है। वैसे मुझ जैसे अज्ञानी को यह तो नहीं पता कि किस चीज से हिन्दू धर्म और देश को खतरा पैदा हो गया है? लेकिन अब बड़े बड़े ज्ञानी पुरुष कह रहे हैं कि देश और धर्म खतरे में है, तो है। इसपे सवाल थोड़े किया जा सकता है। तो आजकल हमारे हिन्दू धर्म पर खतरा चहुं ओर से मडरा रहा है। और इस खतरे को सबसे पहले सूंघा है हमारे धर्म के ठेकेदारों ने। जितना उनकी नाक तेज होती है उतना ही कमजोर भी होती है। तभी तो बात बात में कटने को तैयार रहती है। तो आजकल हिन्दू धर्म कि नाक खतरे में है।

अब मेरे जैसे अज्ञानी जो खतरे को नहीं देख पाते वो उसका समाधान क्या ढूँढेंगे? लेकिन हाँ, हमारे उन्हीं ज्ञानी पुरुषों ने धर्म पर आए खतरे को टालने का समाधान भी ढूंढ लिया है। और वह है हिंदुओं की बढ़ी आबादी। यानि हिन्दू अपनी जनसंख्या बढ़ाकर धर्म पर आए खतरे को मिटा सकता है। यानि अधिक से अधिक बच्चे पैदा करके। लेकिन यहाँ पर एक पेंच फंस गया। जो ज्ञानी लोग आज से हजारों साल बाद होने वाली घटनाओं का सटीक ब्योरा दे देते हैं, वो हिन्दू धर्म पर आ रहे खतरे को समय रहते नहीं भाँप पाये। कुछ मूढ़ यह भी पूंछते हैं कि आज अगर लोगों ने चार-छ्ह या दस बच्चे पैदा करना शुरू भी किया तो उनके बड़े होकर लड़ने तक तो पन्द्रह बीस साल लग जाएँगे, फिर आज के खतरे से कैसे निपटा जाएगा?

लेकिन इससे भी बड़ी परेशानी का सबब है बच्चों कि संख्या में कन्फ़्यूजन। एक ज्ञानी महाराज बोले कि हर हिन्दू को चार चार बच्चे पैदा करना चाहिए। और हर बच्चे का कैरियर भी तय कर दिया कि एक बच्चा देश सेवा करेगा, एक स्वयंसेवक संघ में राजनीति करेगा, एक माँ-बाप कि सेवा करेगा और एक साधुओं को दे। फिर एक और ज्ञानी साध्वी ने भी चार ही बच्चों की थ्योरी बताई । लेकिन इससे धर्म कि सुरक्षा कैसे होगी यह नहीं बताया । क्या साधु सन्यासी खुद धर्म की रक्षा के लिए नहीं लड़ सकते? ये सिर्फ बताने के लिए हैं? अभी चार बच्चों पर तकरार चल ही रही थी कि एक ज्ञानी शंकराचार्य ने दस बच्चों की थ्योरी ईजाद कर दी।

आम पब्लिक इस इंतजार में है कि बच्चों कि संख्या फाइनल हो तो काम शुरू करे। लेकिन इन ज्ञानियों ने कन्फ़्यूजन फैला रखा है। ऊपर से सरकार कहती है कि बच्चे दो ही अच्छे। पब्लिक करे तो क्या करे? इन ज्ञानियों को पब्लिक की परेशानी कहाँ समझ आती है। आखिर बच्चे पालना कोई बच्चों का खेल तो है नहीं। तुलसी बाबा ने कहा था कि – जाके पैर ना फटी बेवाई, सो क्या जाने पीर पराई। तो इन सन्यासियों को क्या पता कि बच्चे कितने अच्छे? अब इन ज्ञानियों को कौन समझाये कि संख्या बल से कोई जीतता तो मुट्ठी भर अंग्रेज़ पूरी दुनिया ना जीत पाते। 

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Comment

आपकी राय

Very nice Sir, you always highlight important point of the country.

भाई रावण कब तक जलाएंगे लाखों खुले आम घूम रहे हैं उनका क्या होगा और कब होगा??

Wha kya baat hain.

एकदम झन्नाटेदार थप्पड़ की तरह रसीद किया है भाई आपने ये जागरूकता चरस भरा व्यंग्यात्मक लेख। उम्मीद है कि hard-core चरसीयों पर भी भारी पड़े आपका ये जागरूक करने वाला चरस।

आप का व्यंग्य बहुत अच्छा है ,एक चुटकी चरस का असर बहुत है।

Jara saa vyngy roopi charas bhii chakh lenaa chahiye .Dil khush ho jaataa hai.bahut khoob kaha......

सटीक व्यंग्य। फ़िल्म में किसी महा पुरूष या स्त्री का किरदार निभाकर क्या वास्तविक जीवन में भी वैसा होने का दावा कर सकता/सकती है। इसके नकारात्मक पहलू को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता । डायन/ चुड़ैल/ वेश्या / चोर/ डकैत/ बलात्कारी का किरदार निभाने वालों के बारे में केवल कल्पना करें तो...

Bahut khub sir

वास्तविकता यही है। सम्मान की भावना नहीं है कहीं भी।

Waw that's so funny but to the point

Ati uttam sir

उचित कहा, यह हमारी विडंबना है कि हमें हिन्दी पखवाड़ा मनाना पड़ता है |

बहुत सुंदर प्रस्तुति। वास्तव में ये बड़ी विपरीत धारणा हमारे देश मे है कि हिन्दी भाषी लोग पिछड़े होते है शायद इसी कारण अंग्रेजी में बात करना लोग अपनी शान और अग्रिम पंक्ति में बने रहना मानते है। आपको बहुत बधाई। आगे भी आपकी व्यग्य यात्रा और विकसित स्तर पर पहुचे। शुभकामनाये

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आईने के सामने (काव्य संग्रह) का विमोचन 2014

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चिकोटी (ब्यंग्य संग्रह) का विमोचन 2012

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आदरणीय  कुशवाहा जी प्रणाम। कमेन्ट के लिए धन्यवाद ।
मनोज जी, अत्यंत सुंदर व्यंग्य रचना। शायद सत्ताधारियों के लिए भी जनता अब केवल हंसी-मजाक विषय रह गई है. जब चाहो उसका मजाक उड़ाओ और उसी के नाम पर खाओ&...
कुछ न कुछ तो कहना ही पड़ेगा , जानी साहब. कब तक बहरे बन कर बैठे रहेंगे. कब तक अपने जज्बातों को मरते हुए देखेंगे. आखिर कब तक. देश के हालात को व्यक्त क...
स्नेही जानी जी , सादर ,बहुत सुन्दर भाव से पूर्ण कविता ,आज की सच्चाई को निरुपित करती हुई . सफल प्रस्तुति हेतु बधाई .
तरस रहे हैं जो खुद, मय के एक कतरे को, एसे शाकी हमें, आखिर शराब क्या देंगे? श्री मनोज कुमार जी , नमस्कार ! क्या बात है ! आपने आदरणीय डॉ . बाली से...