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मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

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पड़ा अकाल बनाओ माल !!

कभी बुजुर्ग कहते थे कि भगवान जब देता है छप्पड़ फाड़ के देता है। अब जाकर उसका मतलब समझ में आया है। भगवान गरीबों का छप्पड़ फाड़ता है, तब अमीरों को देता है। कभी आपने सुना है कि भगवान जब देता है फ्लैट फाड़ के या फार्महाउस फाड़ के देता है? नहीं ना ! क्योंकि सूखा हो या बाढ़, छप्पड़ तो गरीबों का ही फटता है। आजकल देश में फिर से गरीबों के छप्पड़ फाड़ने का समय आया हुआ है। यानी कि देश में सूखा घोषित हो रहा है।

इससे जहां शासक वर्ग में खुशी कि लहर दौड़ रही है, वहीं शासित वर्ग को फिर से छप्पड़ फटने की चिंता हो रही है। सूखे के फायदे बहुआयामी हैं, बहुत ब्यापक हैं। हर वर्ग को सूखे से बहुत उम्मीदें हैं। मुख्यमंत्री जी इसलिए खुश हैं, कि अब सूखे से निपटने के लिए प्रधानमंत्री से बड़ा सा पैकेज लेंगे। और पैकेज खुले ना खुले, सारे नेताओं और मंत्रियों की किस्मत जरूर खुल जाएगी।

जिलाधिकारी मुंछों पर ताव दे रहे हैं कि जिले के लिए राहत पैकेज मिलेगा। और यह राहत पैकेज, सूखे में कहाँ सूख जाएगा, इसकी खबर भी किसी को नहीं मिलेगी। अफसर –मंत्री सूखे से खुश तो जरूर हैं, पर मलाल यह है कि अगर बाढ़ होती, तो हेलीकाप्टर से सैर (अरे नहीं नहीं, दौरा) करते। अब सूखे में कार से सड़क पर चलना पड़ेगा। अब ये लोग कोई सड़क छाप तो होते नहीं कि सड़क पर चलें। वैसे भी, वे तो जनता को सड़कों पर लाने में माहिर होते हैं।

हाँ तो बात चल रही थी खुशी की। प्रधानमंत्री सूखे के नाम पर बहुत से नए कर लगाएंगे। विश्व बैंक से सहायता लेंगे। और उसमें से कितनी सहायता स्विस बैंक पहुँच जाएगी, इसे तो रामदेव बाबा सात जन्मों में भी नहीं पता कर पाएंगे। और जनता के पास इस अकाल में, अन्न नहीं, सिर्फ अन्ना रह जाएंगे ।    

छोटे छोटे दुकानदारों पर, सूखा सुनकर ही धन वर्षा होने लगती है। दुकानदार पहले ही सामानों का दाम बढ़ाकर, जनता का छप्पड़ फाड़ने लगते हैं। सूखे के नाम पर हर सामान का दाम बढ़ जाता है। चाहे वह खेत में पैदा हो या फैक्टरी में । अकाल सबका पड़ जाता है। वैसे अकाल में कुछ पैदा हो या ना हो, कुकुरमुत्ते की तरह एनजीओ जरूर उगने शुरू हो जाते हैं। इनकी नजर सरकार के राहत पैकेजों और जनता के चंदों पर ज्यादा, जनता की राहत पर कम होती है।

अकाल से सबसे ज्यादा फायदा तो पंडो-पुजारियों का होता है। कर्नाटक सरकार ने वर्षा होने के लिए यज्ञ –हवन करने के लिए पूरे राज्य में 17 करोड़ रुपये आवंटित किया है। कुछ समय पहले राजस्थान की वसुंधरा सरकार ने भी एसे ही टोटके किए थे। अब वर्षा हो या ना हो, पंडों-पुजारियों पर धन वर्षा तो होती ही है।

वैसे अकाल केवल पानी ना बरसने से नहीं होता। अकाल बहुत सी चीजों का हो सकता है। आजकल हमारे देश में बहुत तरह के अकाल पड़े हुये हैं। सबसे बड़ा अकाल तो ईमानदारी का है। सब तरफ भ्रष्टाचार की बाढ़ है। ईमानदारी का अकाल है। लोकतन्त्र में लोकहित का अकाल है। लोगों में सदाचार और संयम का अकाल है। अधिकारी में ज़िम्मेदारी का अकाल है। भाषणों-उपदेशों कि बाढ़ है, उन पर अमल का अकाल है। लेकिन क्या फर्क पड़ता है। हम लोग हर स्थिति का फायदा उठाने में माहिर हैं। इसीलिए तो कहते हैं, पड़ा अकाल- बनाओ माल। 

 

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आपकी राय

आज का ज्वलन्त मुद्दा गाय, गोबर, गोमूइ राम मंदिर हिन्दू खतरे में हैं ये सब देशभक्त नहीं हो सकते हैं जिनको बेरोजगारी किसान मजदूर की चिंता है।

आदरणीय श्री सुप्रभात। ज्वलंत मुद्दों को सालिनता से सबों के समक्ष परोसने में माहिर आपके लेखन और लेखनी को कोटि कोटि नमन है। बहुत ही बढ़िया लेख।

आजकल के हालात पर करारा तमाचा काश सारी जनता समझ सके

बहुत बढ़िया।

क्या किया जाए सर।।
UPSC आप बिना अंग्रेजी पास नही कर सकते, कोर्ट HC and SC की सरकारी भाषा अंग्रेजी है, ट्रैन के ac में बैठकर आप अंग्रेजी न बोलो तो लोग जाहिल समझते है और उससे भी बड़ी बात यदि किसी पर हिंदी में गुस्सा उतार दिए तो गाली देगा अंग्रेजी में उतार दिए तो चुपचाप सुन लेगा , डर जाएगा।।
ऐसी स्थिति में हिंदी का राष्ट्रव्यापी होना मुश्किल है, पर राजभाषा है तो वार्षिक ही सही जश्न मनाना बनता है।।
हिंदी के प्रोत्साहन कार्यक्रम पर आप इनाम की रकम और मिठाई का डब्बा हटा कर देखिये कैसे भाग लेने वाले अधिकारियों कर्मचारियों में कमी आएगी।।
फिर भी मुबारक आपने इस ओर ध्यान दिया।।

चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात वाली कहावत हिंदी पखवाणा के लिए चरितार्थ हो रही है नाम मातृभाषा है उसके प्रचार प्रसार के लिए इतना कुछ करना पडता है । अफसोस??

महान व्यंग्य महान सेवक की पहचान बताने के लिए

बहुत ही बेहतरीन समकालीन व्यंग्य आदरणीय

लाजवाब मनोजजी

Manoj Jani bolta bahi jo he sahi soach ka badsah jani

वाह! साहेब जी, खूबसूरत ग़ज़ल बनाये हैं।

Behtreen andaj!!Ershad!!!

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चिकोटी (ब्यंग्य संग्रह) का विमोचन 2012

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आदरणीय  कुशवाहा जी प्रणाम। कमेन्ट के लिए धन्यवाद ।
मनोज जी, अत्यंत सुंदर व्यंग्य रचना। शायद सत्ताधारियों के लिए भी जनता अब केवल हंसी-मजाक विषय रह गई है. जब चाहो उसका मजाक उड़ाओ और उसी के नाम पर खाओ&...
कुछ न कुछ तो कहना ही पड़ेगा , जानी साहब. कब तक बहरे बन कर बैठे रहेंगे. कब तक अपने जज्बातों को मरते हुए देखेंगे. आखिर कब तक. देश के हालात को व्यक्त क...
स्नेही जानी जी , सादर ,बहुत सुन्दर भाव से पूर्ण कविता ,आज की सच्चाई को निरुपित करती हुई . सफल प्रस्तुति हेतु बधाई .
तरस रहे हैं जो खुद, मय के एक कतरे को, एसे शाकी हमें, आखिर शराब क्या देंगे? श्री मनोज कुमार जी , नमस्कार ! क्या बात है ! आपने आदरणीय डॉ . बाली से...