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मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

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निंदा है, तो जिंदा है...

       निन्दा रस का मजा सोमरस से भी ज्यादा आता है। यह एक सर्व सुलभ, सर्व ब्यापी, महंगाई से परे, सर्व ग्राही चीज है। निन्दा का आविष्कार हमारे देश में कब हुआ, यह तो परम निंदनीय ब्यक्ति ही बता सकता है। लेकिन आजकल इसका प्रयोग हमारे परम आदरणीय लोग खूब कर रहे हैं।

      पाकिस्तान जब जब हमारी सीमा में घुसकर हमारे सैनिकों की हत्या करवाता है। तब तब भारत के परम पराक्रमी शूर वीर, दिल्ली की संसद में घोर निन्दा करते हैं। दिल्ली की गलियों में घूम घूम कर निंदा करते हैं। देश की रैलियों में बारम्बार निन्दा करते है। मुलायम निंदा से लेकर कठोर निंदा तक, निंदा करते हैं। कमजोर निंदा से लेकर घोर निंदा तक निंदा करते हैं। जो लोग निंदा नहीं करते, लोग उनकी भी जमकर निंदा करते हैं। इसी तरह अगर चीन भी  हमारी सीमा में घुस आए तो वो भी बचता नहीं। हम लोग उन्हें भी नहीं बख्शते । हम लोग उनकी भी पानी पी-पी कर निन्दा करते हैं ।

      पहले एसी घटनाओं पर हम लोग और विपक्ष, सरकार की खूब निंदा करते थे। लेकिन जब मोदी जी सरकार में आए तो, निंदा की दिशा विपक्ष की ओर मुड गयी। अब एसी घटनाओं के लिए विपक्ष की खूब निंदा की जाती है। विपक्ष से इस्तीफा मांगा जाता है। सरकार भी अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए, जमकर निंदा करती है। कभी नेहरू की निंदा। कभी इन्दिरा की निंदा। राहुल और सोनिया तो मोदी सरकार के लिए प्रात: निंदनीय लोग हैं। इनका हर प्रवक्ता, मंत्री, टीवी चैनलों पर इनकी गला फाड़-फाड़ कर निंदा करते हैं। सरकार कुछ करे या न करे, विपक्ष की निंदा जरूर करती है।

      हमलोग क्या गज़ब की निन्दा करते हैं। बेचारे पाकिस्तानी और चीनी इस निन्दा से डरकर, पाकिस्तान और चीन का भारत में विलय करने की सिफ़ारिश कर रहे हैं। लेकिन हम लोग उसकी भी निंदा करते हैं। हमारी निन्दा मिशाइल से बाकी के देश भी इतने ज्यादा भयभीत हो गए हैं कि अमेरिका भी, एन्टी-निन्दा मिशाइल विकसित करने में लग गया है, क्योंकि उसे भारत के निन्दा मिशाइल जैसे आधुनिक और मारक अस्त्र के बारे में पता चल गया है।

      निन्दा मिशाईल को घर में बैठकर ही दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने पर दागा जा सकता है। किसी भी मौसम में, कभी भी, अपनी सुविधानुसार। निन्दा मिशाइल, सभी मिशाइलों से ज्यादा मारक और परमाणु बम से भी ज्यादा घातक है। इसके इसी महत्व को देखते हुये हमारी सरकार ने, किसानों की भूमि का विधेयक या लोकपाल विधेयक भले ना पास किया हो, निन्दा प्रस्ताव बहुमत से एक क्षण में ही पास कर देती है।

      कुछ निंदनीय लोग तो यह भी कह रहे हैं कि सरकार की चूक के कारण ही आतंकवादी, हमारे सैनिकों पर जानलेवा हमला करने में सफल हो जाते हैं। सरकारी एजेंसियों जैसे रॉ, आईबी आदि के फेलर से आतंकवादी अपने मंसूबों में सफल हो जाते हैं, इस पर सरकार की भी निन्दा की जानी चाहिए। शायद उन्हें पता ही नहीं कि निन्दा जैसे हथियारों का सरकार पर प्रयोग करना, आम आदमी को सीधे जेल भिजवा सकता है। वैसे भी निन्दा मिशाइल का प्रयोग सरकार का विशेषाधिकार है। और सरकार के पास पहले से ही, बहुत सी बातों के निन्दा प्रस्ताव पेंडिंग हैं।

      अभी उसे विपक्ष कि निन्दा करनी है लोकपाल ना पास करने के लिए। रैलियों में पाकिस्तान की निंदा करनी है। चुनाव आ रहा है, चुनाव आयोग की भी निन्दा करनी होगी, बन्दिशें लगाने के लिए। उन पत्रकारों की निंदा करनी है, जो जनता के मुद्दे उठाते हैं।  उन छात्रों की निंदा करनी है, जो दिन रात रोजगार- रोजगार चिल्लाते रहते हैं। किसानों की निंदा करनी है आत्महत्या करने के लिए। जनता की भी निन्दा करनी है, महँगाई और पेट्रोल के दाम पर चिल्लाने के लिए।

      इतनी सारी परमावश्यक निंदाओं को छोड़कर, सरकार अब सैनिकों के मरने पर भी कुछ करे? कह तो दिया सैनिक तो मरने के लिए ही होते हैं। कुछ ने उस कहने की भी निन्दा कर दी। निंदा है, तो जिंदा हैं। अब क्या सरकार की जान लेंगे? मेरे जैसे तुच्छ कवि ने निन्दा के इस गुण को देखकर ही यह निंदनीय दोहा लिखा है:

निन्दक दिल्ली राखिए, संसद में बैठाय ।
बिन गोली-बंदूक के, दुश्मन देई उड़ाय ॥

 

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Comment

आपकी राय

Wha kya baat hain.

एकदम झन्नाटेदार थप्पड़ की तरह रसीद किया है भाई आपने ये जागरूकता चरस भरा व्यंग्यात्मक लेख। उम्मीद है कि hard-core चरसीयों पर भी भारी पड़े आपका ये जागरूक करने वाला चरस।

आप का व्यंग्य बहुत अच्छा है ,एक चुटकी चरस का असर बहुत है।

Jara saa vyngy roopi charas bhii chakh lenaa chahiye .Dil khush ho jaataa hai.bahut khoob kaha......

सटीक व्यंग्य। फ़िल्म में किसी महा पुरूष या स्त्री का किरदार निभाकर क्या वास्तविक जीवन में भी वैसा होने का दावा कर सकता/सकती है। इसके नकारात्मक पहलू को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता । डायन/ चुड़ैल/ वेश्या / चोर/ डकैत/ बलात्कारी का किरदार निभाने वालों के बारे में केवल कल्पना करें तो...

Bahut khub sir

वास्तविकता यही है। सम्मान की भावना नहीं है कहीं भी।

Waw that's so funny but to the point

Ati uttam sir

उचित कहा, यह हमारी विडंबना है कि हमें हिन्दी पखवाड़ा मनाना पड़ता है |

बहुत सुंदर प्रस्तुति। वास्तव में ये बड़ी विपरीत धारणा हमारे देश मे है कि हिन्दी भाषी लोग पिछड़े होते है शायद इसी कारण अंग्रेजी में बात करना लोग अपनी शान और अग्रिम पंक्ति में बने रहना मानते है। आपको बहुत बधाई। आगे भी आपकी व्यग्य यात्रा और विकसित स्तर पर पहुचे। शुभकामनाये

नारायण सिंह जी, प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद। आपने बहुत सही बात की तरफ ध्यान खींचा है। विधवा के सिर से बिन्दी, की तरफ। ये 9 साल पुराना व्यंग्य है जैसा कि आप तारीख देख रहे होंगे। आगे इस तरह की बातों का ध्यान रखूंगा। दूसरी बात कि भाषण ज्यादा अंग्रेजी में हो गया, यही तो व्यंग्य है।
आपका बहुत आभार।

अतिसुन्दर रचना सर,,,मातृभाषा होते हुए भी बहुत से लोग इंग्लिश बोलना अपनी शान समझते हैं चाहे वो टूटी फूटी इंग्लिश ही क्यो ना बोले।

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आईने के सामने (काव्य संग्रह) का विमोचन 2014

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चिकोटी (ब्यंग्य संग्रह) का विमोचन 2012

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आदरणीय  कुशवाहा जी प्रणाम। कमेन्ट के लिए धन्यवाद ।
मनोज जी, अत्यंत सुंदर व्यंग्य रचना। शायद सत्ताधारियों के लिए भी जनता अब केवल हंसी-मजाक विषय रह गई है. जब चाहो उसका मजाक उड़ाओ और उसी के नाम पर खाओ&...
कुछ न कुछ तो कहना ही पड़ेगा , जानी साहब. कब तक बहरे बन कर बैठे रहेंगे. कब तक अपने जज्बातों को मरते हुए देखेंगे. आखिर कब तक. देश के हालात को व्यक्त क...
स्नेही जानी जी , सादर ,बहुत सुन्दर भाव से पूर्ण कविता ,आज की सच्चाई को निरुपित करती हुई . सफल प्रस्तुति हेतु बधाई .
तरस रहे हैं जो खुद, मय के एक कतरे को, एसे शाकी हमें, आखिर शराब क्या देंगे? श्री मनोज कुमार जी , नमस्कार ! क्या बात है ! आपने आदरणीय डॉ . बाली से...