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मनोज जानी

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निंदक दिल्ली राखिए..............

August 26, 2013

निन्दा रस का मजा सोमरस से भी ज्यादा आता है। यह एक सर्व सुलभ, सर्व ब्यापी, महंगाई से परे, सर्व ग्राही चीज है। निन्दा का आविष्कार हमारे देश में कब हुआ, यह तो परम निंदनीय ब्यक्ति ही बता सकता है। लेकिन आजकल इसका प्रयोग हमारे परम आदरणीय लोग खूब कर रहे हैं।

पाकिस्तान ने हमारी सीमा में घुसकर हमारे पाँच सैनिकों की हत्या कर दी। भारत के परम पराक्रमी शूर वीरों ने दिल्ली की संसद में घोर निन्दा की। बारम्बार निन्दा की। इसी तरह चीनी सैनिक भी हमारी सीमा में घुस आए थे। लेकिन हमनें उन्हें भी नहीं बक्शा। हमने उनकी भी पानी पी-पी कर निन्दा की। क्या गज़ब की निन्दा की। बेचारे पाकिस्तानी और चीनी इस निन्दा से डरकर, पाकिस्तान और चीन का भारत में विलय करने की सिफ़ारिश कर रहे हैं।

इतना ही नहीं, हमारी निन्दा मिशाइल से बाकी के देश भी इतने ज्यादा भयभीत हो गए हैं की अमेरिका भी एन्टी-निन्दा मिशाइल विकसित करने में लग गया है, क्योंकि उसे भारत के निन्दा मिशाइल जैसे आधुनिक और मारक अस्त्र के बारे में पता चल गया है। निन्दा मिशाईल को घर में बैठकर ही दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने पर दागा जा सकता है। किसी भी मौसम में, कभी भी, अपनी सुविधानुसार।

निन्दा मिशाइल, सभी मिशाइलों से ज्यादा मारक और परमाणु बम से भी ज्यादा घातक है। इसके इसी महत्व को देखते हुये हमारी सरकार ने, किसानों की भूमि का विधेयक या लोकपाल विधेयक भले ना पास किया हो, निन्दा प्रस्ताव बहुमत से एक क्षण में ही पास कर दिया।

कुछ अज्ञानी लोग तो यह भी कह रहे हैं कि सरकार ने हमारे सैनिकों के सिर काटने पर भी कुछ नहीं किया, इस पर सरकार कि निन्दा कि जानी चाहिए। शायद उन्हें पता ही नहीं कि निन्दा जैसे हथियारों का सरकार पर प्रयोग करना, आम आदमी को सीधे जेल भिजवा सकता है। वैसे भी निन्दा मिशाइल का प्रयोग सरकार का विशेषाधिकार है। और सरकार के पास पहले से ही, बहुत सी बातों के निन्दा प्रस्ताव पेंडिंग हैं।

अभी उसे विपक्ष कि निन्दा करनी है लोकपाल ना पास कराने के लिए। चुनाव आ रहा है, चुनाव आयोग की भी निन्दा करनी होगी, बन्दिशें लगाने के लिए। जनता की निन्दा करनी है, महँगाई और गिरते रुपये के लिए चिल्लाने के लिए। इतनी सारी परमावश्यक बातों को छोड़कर, अब सैनिकों के मरने पर कुछ करे। कह तो दिया सैनिक तो मरने के लिए ही होते हैं। कुछ ने उस कहने कि भी निन्दा कर दी। अब क्या सरकार कि जान लेंगे? मेरे जैसे तुच्छ कवि ने निन्दा के इस गुण को देखकर ही लिखा है कि:

निन्दक दिल्ली राखिए, संसद में बैठाय ।

बिन गोली-बंदूक के, दुश्मन देई उड़ाय ॥

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