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मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

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खोदने की कला !!

हमारे देश में खोदने और खुदवाने की बहुत ही विकसित परम्परा रही है। विभीषण ने रावण की जड़ खोदकर राम से उसका संहार करवाया। तो मंथरा ने कैकेयी रानी को खोद-खोदकर वरदान की याद दिलाई और राम को वन भेजवाया। पहले राजा महाराजा कुएं खुदवाया करते थे, तो आजकल अपराधी लोग जेल खोदकर फुर्र हो जाते हैं। लेकिन खोदने और खुदवाने का कार्य अनवरत रूप से जारी है।

इधर एक बाबा ने सपना देखा कि एक पुराने किले के नीचे जमीन में एक हजार टन सोना गड़ा है। सरकार ने उनकी बात मानकर खुदाई शुरू कर दी। वैसे भी सरकार को तो खोदने में महारत हासिल है। कोई विरोधी हो तो सीबीआई से उसके गड़े मुर्दे एसे खुदवाती है कि जैसे कुबेर का खजाना निकलेगा। फिर आखिर जमीन के नीचे दबे इस खजाने को वह कैसे छोड़े।

एक जमाने में जब तहलका नामक पत्रिका ने हथियारों में दलाली का स्टिंग करके दलालों कि जड़ खोद दी, तो तत्कालीन सरकार ने सारी मशीनरी लगाकर तहलका की एसे जड़ खोदी कि उसे अपनी जड़ जमाने में कई साल लगे। अशोक खेमका नामक अधिकारी ने जब एक नेता के रिसतेदार पर  गलत दस्तावेजों द्वारा जमीन खरीदने की जाँच की, तो राज्य सरकार ने खेमका के खिलाफ ही इस बात की जाँच बैठा दी कि अपने कार्यकाल के दौरान वह बीज बेंचने का लक्ष्य पूरा नहीं कर सके थे। वैसे बात तो सही है, जो अधिकारी बीज नहीं बेंच सकता, वह देश क्या बेंच पाएगा? एसे अधिकारियों को तो तत्काल ही बर्खास्त कर देना चाहिए। 

खोदने का काम एकदम अलौकिक होता है। जब कभी सास-बहू का झगड़ा होता है तो दोनों एक दूसरे की एसी जड़ खोदती हैं की उसे उगने में बरसों लग जाए। कैग- विजिलेन्स हमेशा फावड़े लेकर अधिकारियों की जड़ खोदने को तत्पर रहती हैं, जैसे सारा कारू का खजाना बेचारे अधिकारियों के घर में ही मिलेगा।

चुनाव में खुदाई कला का जबरदस्त इस्तेमाल होता है। जो जितना ज्यादा विरोधियों की जड़ खोद सकता है, उतना ही वह विरोधियों से आगे हो जाता है। आजकल चुनावों के मौसम में, सभी राजनैतिक दल अपने-अपने फावड़ों पर धार दे रहे हैं, जिससे विरोधियों की जड़ गहराई तक खोदी जा सके।

आजकल एक नई तरह की खुदाई का ज़ोर है। जिसे मैंने नाम दिया है- ई-खुदाई। ई-खुदाई, घर बैठे मोबाइल, टैबलेट, लैप-टाप या कंप्यूटर से होती है। इन हथियारों से आप फेशबुक या ट्विटर के जरिये अपने विरोधियों की जड़ खोद सकते हैं। 

इस बीच कुछ लोग एसे भी हैं, जो रेत खोद रहे हैं, नदी खोद रहे हैं। जिनकी सरकार में ज्यादा पहुँच है, वे कोयले की खानें खोद रहे हैं। और जब भी कोई ईमानदार अधिकारी इनकी जड़ें खोदने की कोशिश करता है, सारे मिलकर उसको ही खोदकर दफन कर देते हैं। 

कोई हवाला को खोद रहा है, कोई बाबरी मस्जिद को। कोई तहलका और पेट्रोल पम्प को खोद रहा है, तो कोई टू जी, कामनवेल्थ और कोयले को खोद रहा है। कोई राबर्ट बढेरा की जड़ खोद रहा है तो कोई कल्याण सिंह की। कोई सेकुलरिज़्म की जड़ खोद रहा है कोई धर्मनिरपेक्षता की। कोई लोकतंत्र को खोद रहा है कोई संविधान को। जिन्हे कुछ नहीं मिलता वो क्रिकेट के स्टेडियम खोद कर ही संतोष कर लेते हैं।

सब एकाग्रचित्त होकर खुदाई में लगे है। लेकिन इस खुदाई में दफन आम आदमी हो रहा है, जिसे लाख खोदने पर भी आजतक कर्मठ-ईमानदार नेता नहीं मिला। सालों खोदने पर भी साफ पानी, बिजली, सड़क, भरपेट भोजन नहीं मिला। इस सतत खुदाई को देखकर एक शेर याद आता है जिसे किसी पीडबल्यूडी इंजीनियर ने लिखा है कि:

“आगे भी खुदा है, पीछे भी खुदा है। इधर भी खुदा है, उधर भी खुदा है। बाखुदा जहाँ नहीं खुदा है, वहाँ कल खुदा होगा”। 

पब्लिक को इंतजार दोनों खुदाइयों का है, कि किले को खोदने से एक हजार टन सोना निकलता है कि नहीं और इस चुनाव में नेताओं द्वारा एक-दूसरे कि जड़ खोदने पर कोई अच्छा-टिकाऊ नेता जनता को मिलता है कि नहीं।

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Comment

आपकी राय

Very nice Sir, you always highlight important point of the country.

भाई रावण कब तक जलाएंगे लाखों खुले आम घूम रहे हैं उनका क्या होगा और कब होगा??

Wha kya baat hain.

एकदम झन्नाटेदार थप्पड़ की तरह रसीद किया है भाई आपने ये जागरूकता चरस भरा व्यंग्यात्मक लेख। उम्मीद है कि hard-core चरसीयों पर भी भारी पड़े आपका ये जागरूक करने वाला चरस।

आप का व्यंग्य बहुत अच्छा है ,एक चुटकी चरस का असर बहुत है।

Jara saa vyngy roopi charas bhii chakh lenaa chahiye .Dil khush ho jaataa hai.bahut khoob kaha......

सटीक व्यंग्य। फ़िल्म में किसी महा पुरूष या स्त्री का किरदार निभाकर क्या वास्तविक जीवन में भी वैसा होने का दावा कर सकता/सकती है। इसके नकारात्मक पहलू को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता । डायन/ चुड़ैल/ वेश्या / चोर/ डकैत/ बलात्कारी का किरदार निभाने वालों के बारे में केवल कल्पना करें तो...

Bahut khub sir

वास्तविकता यही है। सम्मान की भावना नहीं है कहीं भी।

Waw that's so funny but to the point

Ati uttam sir

उचित कहा, यह हमारी विडंबना है कि हमें हिन्दी पखवाड़ा मनाना पड़ता है |

बहुत सुंदर प्रस्तुति। वास्तव में ये बड़ी विपरीत धारणा हमारे देश मे है कि हिन्दी भाषी लोग पिछड़े होते है शायद इसी कारण अंग्रेजी में बात करना लोग अपनी शान और अग्रिम पंक्ति में बने रहना मानते है। आपको बहुत बधाई। आगे भी आपकी व्यग्य यात्रा और विकसित स्तर पर पहुचे। शुभकामनाये

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आईने के सामने (काव्य संग्रह) का विमोचन 2014

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आदरणीय  कुशवाहा जी प्रणाम। कमेन्ट के लिए धन्यवाद ।
मनोज जी, अत्यंत सुंदर व्यंग्य रचना। शायद सत्ताधारियों के लिए भी जनता अब केवल हंसी-मजाक विषय रह गई है. जब चाहो उसका मजाक उड़ाओ और उसी के नाम पर खाओ&...
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स्नेही जानी जी , सादर ,बहुत सुन्दर भाव से पूर्ण कविता ,आज की सच्चाई को निरुपित करती हुई . सफल प्रस्तुति हेतु बधाई .
तरस रहे हैं जो खुद, मय के एक कतरे को, एसे शाकी हमें, आखिर शराब क्या देंगे? श्री मनोज कुमार जी , नमस्कार ! क्या बात है ! आपने आदरणीय डॉ . बाली से...