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मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

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खुश है जमाना आज.....

खुश है जमाना आज पहली तारीख है। यह गाना 30-40 सालों के बाद 2017 मे जाकर अपने लक्ष्य को प्राप्त हुआ है। पहली बार आम हों या खास, नेता हो या अभिनेता, गरीब हो या अमीर, नए साल पर सब खुश हैं। सरकार खुश है, विपक्षी खुश हैं।  सरकार समर्थक तो खुश हैं ही, सरकार विरोधी भी खुश हैं। तकलीफ में लाइन लगने वाला कुछ किन्तुओं परन्तुओं के साथ खुश है, तो बिना लाइन लगाए, रसूख वाला भी खुश है कि बैंक मैनेजर ने उसके घर तक ‘खुशी’ पहुंचा दी है।  और पहली बार जमाना खुश है। सच कहें तो रामराज्य अगर कहीं है तो सिर्फ हमारे देश में, और सिर्फ हमारे देश में है।

खुशी का कारण बड़ा साधारण है। आज से नोटबंदी खतम। पहली बार आप नए साल में दो हजार के नए करारे नोटों के साथ सेल्फ़ी ले सकते हैं, अगर आपने लाइन लगाने की हिम्मत की होगी तो। लेकिन खर्च करने की बिलकुल भी मत सोचिए, क्योंकि छुट्टा माँगने पर आपकी खुशी काफूर हो सकती है।

जैसे आजकल दुकानों पर लिखा होता है कि, फैशन के इस दौर में गारण्टी की आशा ना करें। वैसे ही पेटीएम के इस दौर में, रुपयों की आशा ना करें, और रुपये मिल भी जाएँ, तो खर्चने की कोशिश तो बिलकुल ना करें। दुबारा मिलने की कोई गारण्टी नहीं है, क्योकि कैशलेस के इस दौर में 60 फीसदी एटीएम अपनी मुफ़लिसी से तंग आकर ‘आउट आफ आर्डर’ का बोर्ड लटका चुके हैं।

हमेशा रोने वाली जनता पहली बार खुश है, तो इसका क्रेडिट मोदीजी को जाता है। उन्होने ने देश को बदल दिया है। जब से आए हैं, देश की आलसी-कामचोर जनता को लगातार बदल रहे हैं। कभी गंदगी छोड़ने को कहते हैं, कभी सब्सिडी छोड़ने को। कभी मेक इन इण्डिया और डिजिटल इण्डिया से देश बदलते हैं। तो कभी अध्यादेश पे अध्यादेश लाकर सरकार चलाने के तरीके को, प्रक्रिया को ही बदलते है। वो अलग बात है कि प्रणव दादा कभी कभी इतने बदल जाते हैं कि बोलने लगते हैं कि अध्यादेश से सरकारें नहीं चलती। लेकिन जब केजरीवाल अपने तरीके से कानून लाते हैं तो मोदी सरकार खुद बदल जाती है और प्रक्रिया की  याद दिलाती है।     

मोदी जी अनथक रूप से देश बदलने में लगे हैं। जड़ हो चुके देशवासियों को डायनामिक बनाने पर तुले हुये हैं। ये अलग बात है कि जनता भले डायनामिक ना हुई, सरकार ने रेल के किरायों को तो डायनामिक कर ही दिया। अब तो विरोधी भी  इतने बदल गए हैं कि तो मोदीजी की बातों का मतलब ही बदल देते हैं। मोदीजी बोलते हैं कि देश बदल रहा है, तो वो बोलते हैं कि हाँ, मोदीजी इतनी तेजी से विदेश यात्राएं कर रहे हैं कि उनके हवाईजहाज़ के नीचे लगातार देश बदलते रहते हैं।    

अब देखिए देश के साथ साथ मैं भी इतना बदल गया कि लिखते लिखते मुद्दा ही बदल दिया। अब आते हैं वापस अपने ढर्रे पर, यानी मुद्दे पर। हाँ, तो जमाना खुश है। सरकार खुश है नोटबंदी से कि लोग महँगाई- बेरोजगारी जैसे असली मुद्दों को भूल कर लाइन में खुश हैं। विपक्ष खुश है कि जनता परेशान हो रही है और नोट को बदले ना बदले, सरकार जरूर बदल देगी। समर्थक खुश हैं कि आज से आतंकवाद, नकली नोट, नक्सली, महँगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार जैसी सभी गम्भीर समस्याओं का रामबाण इलाज हो गया है और आज से वो सब समूल नष्ट हो जाएँगी। विरोधी खुश हैं कि नोटबंदी से सरकार की नसबंदी हो जाएगी। गरीब खुश है कि सरकार ने कालाधन ख़त्म करके, अमीरों को बीपीएल बना दिया। अमीर खुश हैं कि बैंकों में फिर से लोन देने लायक पैसा आ गया है। सर्वत्र खुशी का माहौल है। खुश रहने की, ये नई सीख है। खुश है जमाना, कि आज पहली तारीख है। हैप्पी न्यू ईयर।

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Comment

आपकी राय

आप बहुत अच्छा लिखते है आप के व्यंग काबेले तारीफ़ है

बहुत खूब मनोज। बेहतरीन लेख और शानदार व्यंग्य शैली। सच्चाई को लिखने का यह अंदाज काबिले तारीफ़ है। इसे जारी रखिए।

गजब लिखते हो मनोज जी मजा आ गया पढ़कर

सोचने का तरीका बदल दिया या फिर मैं पहले सोच ही नहीं रहा था ।
आंखे खुली होने के बावजूद दिख वहीं रहा था जो सुन रहा था ।
बहुत शानदार....

क्या व्यंग लिखा है सर पढ़कर मजा ही आ गया।

ये लाइन दिल को छू गया।। जबरदस्त observation

बहुत सुन्दर कवि जी. जहाँ न पहुंचे रवि, वहाँ पहुंचे कवि मनोज.

बहुत अच्छा सर। शब्द का सही अर्थ समझाया है आपने.

जो जितना लोगो पर निर्भर है वही आत्मनिर्भर कहलाता है।।।
Great सर
बधाई शानदार व्यंग्य

यथार्थ व्यंग्य सटीक

Jabardast byang kiya he bade bhai...

सच में रिषिवर आपकी जय हो।व्यंग्य काविले तारीफ है। ।

राजनीतिक परिदृश्य में एक सुंदर व्यंगात्मक लेख ।
आपको प्रणाम

Very nice manoj ji

आज तो अकेला चना , अपने बाजे घना रूप से भाड़ फोड़ने में लगा है।।
बहुत बढ़िया सर

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आईने के सामने (काव्य संग्रह) का विमोचन 2014

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चिकोटी (ब्यंग्य संग्रह) का विमोचन 2012

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आदरणीय  कुशवाहा जी प्रणाम। कमेन्ट के लिए धन्यवाद ।
मनोज जी, अत्यंत सुंदर व्यंग्य रचना। शायद सत्ताधारियों के लिए भी जनता अब केवल हंसी-मजाक विषय रह गई है. जब चाहो उसका मजाक उड़ाओ और उसी के नाम पर खाओ&...
कुछ न कुछ तो कहना ही पड़ेगा , जानी साहब. कब तक बहरे बन कर बैठे रहेंगे. कब तक अपने जज्बातों को मरते हुए देखेंगे. आखिर कब तक. देश के हालात को व्यक्त क...
स्नेही जानी जी , सादर ,बहुत सुन्दर भाव से पूर्ण कविता ,आज की सच्चाई को निरुपित करती हुई . सफल प्रस्तुति हेतु बधाई .
तरस रहे हैं जो खुद, मय के एक कतरे को, एसे शाकी हमें, आखिर शराब क्या देंगे? श्री मनोज कुमार जी , नमस्कार ! क्या बात है ! आपने आदरणीय डॉ . बाली से...