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मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

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खाना खाये पब्लिक हमारो....

आजकल हमारे नेता एक से बढ़कर एक सनसनीखेज रहस्योद्घाटन करने में लगे हुये हैं। एक ने कहा, पब्लिक 5 रुपये में खाना खा सकती है। दूसरे ने कहा- पब्लिक 12 रुपये में खा सकती है। उसके बाद एक-एक कर बहुत से नेताओं ने अलग-अलग खाने के रेट का खुलासा किया। तब जाकर मुझ जैसे अज्ञानी को ये पता चला की पब्लिक खाना भी खाती है। वैसे पिछले साल जब इन्हीं नेताओं ने यह सिद्धांत प्रतिपादित किया था की आजकल पब्लिक ज्यादा खाने लगी है, इसी वजह से महँगाई बढ़ी है, तब थोड़ा शक जरूर हुआ था कि शायद पब्लिक भी खाने लगी है। लेकिन इस साल खाने के रेट को जानकर अब तो लगने लगा है कि पब्लिक भी खाती है।

यूँ तो खाने का कापीराइट केवल नेताओं के पास है। संसद की कैंटीन में दो रुपये मे चिकन बिरयानी से लेकर हर सौदे में दलाली-कमीशन-घूस सब खाने का सर्वाधिकार उन्हीं के पास सुरक्षित है। अब जनता ने भी खाना शुरू कर दिया। कहीं जनता ज्यादा ना खा ले, इसीलिए उनके खाने का रेट तय करना बहुत जरूरी था। इसलिए आजकल सभी नेता जनता के खाने का रेट तय करने में लगे हुये हैं।

पहले जनता गम खाती थी, नेताओं के वादों से ही उसका पेट भर जाता था, लेकिन जनता का दिल माँगे मोर। आजकल वह बिजली-पानी-सड़क माँगने लगी है, साइकिल-लैपटाप माँगने लगी है। तो नेता भी क्या करें, कल अगर जनता हर कमीशन में पर्सेंटेज माँगने लगी तो? इसलिए सरकार उनके खाने का अलग से इंतजाम कर रही है। उनके खाने की भी सेक्यूरिटी कर रही है, फूड सेक्यूरिटी कानून लाकर। जिससे जनता अपना हिस्सा लेकर चुप रहे। और उन्हें खाने में कोई परेशानी ना आए।

वैसे भी खाना कोई बच्चों का खेल नहीं है। सीबीआई और विजिलेन्स पीछे पड़ जाते हैं और कोर्ट फुंफकारने लगती है। आजकल लोकपाल और लोकयुक्त जैसी मिर्चें भी खाने में एसिडिटी बढ़ाती हैं। आरटीआई तो पूरा ही खाने को मिड-डे मील बना देती है, खाया तो टें बोल जाओगे। अब इन सब से बच-बचाकर खाना कोई आसान काम है। कितना जोखिम होता है, नेताओं के खाने में। और पब्लिक फ्री-फण्ड की खाना चाहती है, ये तो बहुत नाइंसाफ़ी है। इसलिए नेताओं ने जनता के खाने का रेट तय कर दिया है।

लेकिन जनता के खाने का रेट तय करने से सबसे ज्यादा हलकान-परेशान हमारे खबरिया चैनल हो रहे हैं। निकल पड़े हैं खुली सड़क पर अपना माइक ताने। 5 रूपय्या और 12 रूपय्या में, छप्पन भोग खाने। एसा लग रहा है कि नेता जो बोल देते हैं, सब सच ही होता है। बेचारे मासूम चैनल वाले, दर-दर भटक रहे हैं 5 रुपये कि थाली ढूँढने में। कम खर्चे में, बिना दिल्ली और मुंबई के बाहर गए, मसालेदार खबर तैयार करने में। इसे कहते हैं आम के आम, गुठलियों के भी दाम। कम से कम खर्चे में, भूखी जनता को  भरपेट चटपटी खबरें परोस रहे हैं। जनता भी चटखारे ले लेकर मासूम रिपोर्टर को दिल्ली-मुंबई कि गलियों में 5 रुपये कि थाली खोजने पर ताली पीट रही है। देश में गरीबी का तमाशा चल रहा है 68 सालों से। गरीबी बिक रही है हर चुनाव में। गरीबी मिट रही है हर चुनाव में। गरीबी दिख रही है हर चुनाव में। गरीबी का तमाशा छिपा है, गरीब के खाने के भाव में.........  

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Comment

आपकी राय

Very nice Sir, you always highlight important point of the country.

भाई रावण कब तक जलाएंगे लाखों खुले आम घूम रहे हैं उनका क्या होगा और कब होगा??

Wha kya baat hain.

एकदम झन्नाटेदार थप्पड़ की तरह रसीद किया है भाई आपने ये जागरूकता चरस भरा व्यंग्यात्मक लेख। उम्मीद है कि hard-core चरसीयों पर भी भारी पड़े आपका ये जागरूक करने वाला चरस।

आप का व्यंग्य बहुत अच्छा है ,एक चुटकी चरस का असर बहुत है।

Jara saa vyngy roopi charas bhii chakh lenaa chahiye .Dil khush ho jaataa hai.bahut khoob kaha......

सटीक व्यंग्य। फ़िल्म में किसी महा पुरूष या स्त्री का किरदार निभाकर क्या वास्तविक जीवन में भी वैसा होने का दावा कर सकता/सकती है। इसके नकारात्मक पहलू को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता । डायन/ चुड़ैल/ वेश्या / चोर/ डकैत/ बलात्कारी का किरदार निभाने वालों के बारे में केवल कल्पना करें तो...

Bahut khub sir

वास्तविकता यही है। सम्मान की भावना नहीं है कहीं भी।

Waw that's so funny but to the point

Ati uttam sir

उचित कहा, यह हमारी विडंबना है कि हमें हिन्दी पखवाड़ा मनाना पड़ता है |

बहुत सुंदर प्रस्तुति। वास्तव में ये बड़ी विपरीत धारणा हमारे देश मे है कि हिन्दी भाषी लोग पिछड़े होते है शायद इसी कारण अंग्रेजी में बात करना लोग अपनी शान और अग्रिम पंक्ति में बने रहना मानते है। आपको बहुत बधाई। आगे भी आपकी व्यग्य यात्रा और विकसित स्तर पर पहुचे। शुभकामनाये

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आईने के सामने (काव्य संग्रह) का विमोचन 2014

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चिकोटी (ब्यंग्य संग्रह) का विमोचन 2012

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आदरणीय  कुशवाहा जी प्रणाम। कमेन्ट के लिए धन्यवाद ।
मनोज जी, अत्यंत सुंदर व्यंग्य रचना। शायद सत्ताधारियों के लिए भी जनता अब केवल हंसी-मजाक विषय रह गई है. जब चाहो उसका मजाक उड़ाओ और उसी के नाम पर खाओ&...
कुछ न कुछ तो कहना ही पड़ेगा , जानी साहब. कब तक बहरे बन कर बैठे रहेंगे. कब तक अपने जज्बातों को मरते हुए देखेंगे. आखिर कब तक. देश के हालात को व्यक्त क...
स्नेही जानी जी , सादर ,बहुत सुन्दर भाव से पूर्ण कविता ,आज की सच्चाई को निरुपित करती हुई . सफल प्रस्तुति हेतु बधाई .
तरस रहे हैं जो खुद, मय के एक कतरे को, एसे शाकी हमें, आखिर शराब क्या देंगे? श्री मनोज कुमार जी , नमस्कार ! क्या बात है ! आपने आदरणीय डॉ . बाली से...