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मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

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Blog posts : "गजल "

शराफत देख बन्दों की.......

 

शराफत देख बन्दों की, हुआ करतार सदमें में ।
वफ़ा का हश्र वो देखा, कि है एतबार सदमें में ।

हैं जीते खाप के ही खौफ़ में, कानून और प्रेमी,…

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ये कैसी रात है???

ये कैसी रात है, दिखता नहीं सवेरा है।
जहां-जहां भी नजर जाती है अंधेरा है। 

     जहां थी प्यार की, आबाद अभी तक बस्ती
     वहीं…

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माहौल मुल्क का......

माहौल  मुल्क   का,  ठण्डा   तो   है,
पर  इस  कदर  ठण्डा  भी  नहीं   है ।
कहीं हाथों  में, कत्ल  को  बन्दूक   तो  है
कहीं,चलने के लिये हा…

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बीमार को, अब जहर पिला क्यों नहीं देते???

       छिप कर के दुश्मनों से ,कब तक रहोगे घर में , 

          कुछ हम भी हैं,दुनिया को दिखा क्यों नहीं देते
          बीमार  को, अब जहर  पिला क्यों  नह…

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हम उनको चाहते रहे, दिवानों की तरह.....

हम उनको चाहते रहे, दीवानों की तरह,
मिले हमेशा वो मुझसे, बेगानों की तरह

शम्मा की तरह जल के, ना कर पाये रोशनी,
जलकर भी हमने देखा, परवान…

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काला गुरुवार हो गया है

फिर एक बार काला गुरुवार हो गया है।
अब आदमी का जीना दुश्वार हो गया है।

दिल्ली हो या बनारस, जम्मू हो या की पटना
मुंबई हो या कहीं …

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फिर एक बम फूटा है......

फिर एक बम फूटा है। 
फिर कुछ चीखें निकली हैं,
फिर कुछ लाशें, फिर कुछ घायल
फिर से बहाने, वही तराने, अब तक जो की झूठा है। 
फिर …

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डर लगता है ..

जाने क्यूँ  रिश्तों  पे,एतबार  से  डर  लगता  है ।
अब तो कांटों का क्या,फ़ूलों के वार से डर लगता है।

कल तक, जो जगह  होती थी, इंसाफ़ का मन्दिर,…

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वतन के नाम हो जाए

जहाँ में देश का अपने भी, रोशन नाम हो जाए
अगर एक दिन सियासत का, वतन के नाम हो जाए

गरीबों की सियासत कर, वतन को बेंचने वाले…

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हम बहरों को.....

हम बहरोंको तान, सुनाने बैठ गये।
कौवों को हम गान, सुनाने बैठ गये ।

देश बेंचनें-वाले,  सत्ताधीशों को,
संसद का सम्मान, सुनाने बैठ गये। …

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-- -- हिन्दी पखवाडा -- --

हिन्दुस्तान  में  हिन्दी का, आज  हो  रहा  यह  सम्मान
हिन्दी पखवाडे के अलावा, हिन्दी कभी ना आये ध्यान

भाषण में हम कहते, ‘हिन्दी, बहुत सुबोध, …

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अरमान बहुत है......

नेता बनूँ मैं देश का, अरमान बहुत है।
पर क्या करूँ मैं दिल मेँ, ईमान बहुत है।

संसद हो या तिहाड़, कोई फर्क नहीं ज्यादा
चोरों, लुटे…

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उस दिन से जिंदगी.......

उस दिन से जिंदगी, बहुत आसान हो गयी।
जिस दिन हमारी आप से, पहचान हो गयी।

अब तक ना थी ख़्वाहिश कोई, मंजिल ना इरादा,
अब दिल की सारी ह…

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क्या कहें साहब !!

हम अपने देश के हालात ! क्या कहें साहब !!
दिल में जलते हुये जज़्बात! क्या कहें साहब !!

इतने सालों की, जम्हूरियत का, हासिल क्या?…

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14 Blog Posts

आपकी राय

Very nice Sir, you always highlight important point of the country.

भाई रावण कब तक जलाएंगे लाखों खुले आम घूम रहे हैं उनका क्या होगा और कब होगा??

Wha kya baat hain.

एकदम झन्नाटेदार थप्पड़ की तरह रसीद किया है भाई आपने ये जागरूकता चरस भरा व्यंग्यात्मक लेख। उम्मीद है कि hard-core चरसीयों पर भी भारी पड़े आपका ये जागरूक करने वाला चरस।

आप का व्यंग्य बहुत अच्छा है ,एक चुटकी चरस का असर बहुत है।

Jara saa vyngy roopi charas bhii chakh lenaa chahiye .Dil khush ho jaataa hai.bahut khoob kaha......

सटीक व्यंग्य। फ़िल्म में किसी महा पुरूष या स्त्री का किरदार निभाकर क्या वास्तविक जीवन में भी वैसा होने का दावा कर सकता/सकती है। इसके नकारात्मक पहलू को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता । डायन/ चुड़ैल/ वेश्या / चोर/ डकैत/ बलात्कारी का किरदार निभाने वालों के बारे में केवल कल्पना करें तो...

Bahut khub sir

वास्तविकता यही है। सम्मान की भावना नहीं है कहीं भी।

Waw that's so funny but to the point

Ati uttam sir

उचित कहा, यह हमारी विडंबना है कि हमें हिन्दी पखवाड़ा मनाना पड़ता है |

बहुत सुंदर प्रस्तुति। वास्तव में ये बड़ी विपरीत धारणा हमारे देश मे है कि हिन्दी भाषी लोग पिछड़े होते है शायद इसी कारण अंग्रेजी में बात करना लोग अपनी शान और अग्रिम पंक्ति में बने रहना मानते है। आपको बहुत बधाई। आगे भी आपकी व्यग्य यात्रा और विकसित स्तर पर पहुचे। शुभकामनाये

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आईने के सामने (काव्य संग्रह) का विमोचन 2014

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चिकोटी (ब्यंग्य संग्रह) का विमोचन 2012

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अन्यत्र

आदरणीय  कुशवाहा जी प्रणाम। कमेन्ट के लिए धन्यवाद ।
मनोज जी, अत्यंत सुंदर व्यंग्य रचना। शायद सत्ताधारियों के लिए भी जनता अब केवल हंसी-मजाक विषय रह गई है. जब चाहो उसका मजाक उड़ाओ और उसी के नाम पर खाओ&...
कुछ न कुछ तो कहना ही पड़ेगा , जानी साहब. कब तक बहरे बन कर बैठे रहेंगे. कब तक अपने जज्बातों को मरते हुए देखेंगे. आखिर कब तक. देश के हालात को व्यक्त क...
स्नेही जानी जी , सादर ,बहुत सुन्दर भाव से पूर्ण कविता ,आज की सच्चाई को निरुपित करती हुई . सफल प्रस्तुति हेतु बधाई .
तरस रहे हैं जो खुद, मय के एक कतरे को, एसे शाकी हमें, आखिर शराब क्या देंगे? श्री मनोज कुमार जी , नमस्कार ! क्या बात है ! आपने आदरणीय डॉ . बाली से...