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मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

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सियासत की फसल

September 9, 2013

लाशों पे, सियासत की फसल, बो रहा है वो ।

जलते शहर में भी, सकूँ से, सो रहा है वो ॥

 

किलकारियाँ भरते थे जो, आबाद गली में ,

बस्ती में अब अनाथ कहीं, रो रहा है वो ॥

 

जीने की तमन्ना में यूँ, मजबूर हो गया,

कंधों पे अपनी अस्थियों को, ढो रहा है वो ॥

 

धर्मों के सिखाने से, जो इन्सान ना बना,

तब्दील अब तो वोट में भी, हो रहा है वो ॥

 

गफलत ये थी, कि शहर में, इन्सान बसे हैं,

इसका भी मगर अब तो भरम, खो रहा है वो॥

 

अनपढ़-गरीब होके, भला क्या सिखाए ‘जानी’,

अपने लहू से, उसके ज़ख़म, धो रहा है वो ॥ 

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दुखद लेकिन सत्य है.



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