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मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

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शराफत देखकर बन्दों की.......

June 12, 2013

शराफत देखकर बन्दों की, है करतार सदमें में ।
वफ़ा का हश्र वो देखा, कि है एतबार सदमें में ।

चोरी,  डकैती,  खून,  साजिश,  रेप से भरे,
कहीं टीवी है सदमें में, कहीं अख़बार सदमें में ।

बदलता वक्त का पहिया, ना होता एक सा हरदम,
कभी जनता है सदमें में, कभी सरकार सदमें में ।

खौफ़ में जी रहे हैं खाप के, कानून और प्रेमी,
कहीं सदमें में है दिलवर, कहीं दिलदार सदमे में ।

मुहब्बत और वफ़ा, दौलत से आंकी जा रही है अब,
लगी जब प्यार की बोली, तो अब है प्यार सदमें में ।

बिकती है माँ की कोंख भी, बच्चे भी बिक रहे,
जज्बात, रिश्ते बेंचकर, है अब बाजार सदमें में ।

जिगर के टुकड़े की खातिर, हो जिसने छोड़ी सब खुशियाँ,
उसी ने छोड़ा है जब से, तो माँ बीमार सदमें में ।।

कुर्सी की माला फेरते, जब जिन्दगी कटी,
नहीं कुर्सी मिली तो, चल पड़े हरिद्वार सदमें में ।

तरक्की देख चमचों की, भ्रष्टों, बेईमानों की,
दबाकर दांत में उंगली, खड़ा खुद्दार सदमें में ।।


वकीलों, मुंसिफ़ों छोड़ो, ये ड्रामे और ना खेलो,
हुआ अबतक नहीं कोई भी, गुनहगार सदमें में ।।

 

कहीं नक्सल, कहीं आतंक, या माओ का डर फैला,

कहीं रविवार सदमें में, कहीं बुधवार सदमें में ।

ना जनता को फ़िकर कोई, ना है सरकार को चिंता,
जो सोचे देश की हालत, वही हर बार सदमें में ।

ना तुम बदलोगे, ना हम बदलेंगे, पर ये वक्त बदलेगा,
तो छोड़ो देश की चिंता, ना हो बेकार सदमें में ।।

चलो मयखाने, सुलझातें हैं 'जानी', देश के मसले,
बुला लो शाकी को, और पैग लो, दो-चार सदमें में ।

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bhai bahut umda



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