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मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

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वतन के नाम हो जाए

जहाँ में देश का अपने भी, रोशन नाम हो जाए

अगर एक दिन सियासत का, वतन के नाम हो जाए

 

गरीबों की सियासत कर, वतन को बेंचने वाले

अगर कुछ ना करें तो भी, बहुत से काम हो जाए

 

उन्हें यूँ सब्सिडी, सेन्सेक्स से, क्या फर्क पड़ता है

जिन्हें एक रोटी की मेहनत, सुबह से शाम हो जाए।

 

लिए हाथों में सब इमाँ, खड़े आतुर हैं बिकने को,

यही बस आरजू सबकी, कि अच्छा दाम हो जाए।

 

गुनहगारों को भी, कानून का डर, तब सताएगा

अगर मुजरिम का, मुजरिम सा, कभी अंजाम हो जाए

 

मजा सावन की बारिश का, तो बस गावों में आता है,

शहर में हो जरा बारिश, की लंबा जाम हो जाए

 

कौन कहता है कि, चर्चे हमारे, हो नहीं सकते

बहुत आसान है ‘जानी’, अगर बदनाम हो जाएँ 

 

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आईने के सामने (काव्य संग्रह) का विमोचन 2014

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चिकोटी (ब्यंग्य संग्रह) का विमोचन 2012

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आदरणीय  कुशवाहा जी प्रणाम। कमेन्ट के लिए धन्यवाद ।
मनोज जी, अत्यंत सुंदर व्यंग्य रचना। शायद सत्ताधारियों के लिए भी जनता अब केवल हंसी-मजाक विषय रह गई है. जब चाहो उसका मजाक उड़ाओ और उसी के नाम पर खाओ&...
कुछ न कुछ तो कहना ही पड़ेगा , जानी साहब. कब तक बहरे बन कर बैठे रहेंगे. कब तक अपने जज्बातों को मरते हुए देखेंगे. आखिर कब तक. देश के हालात को व्यक्त क...
स्नेही जानी जी , सादर ,बहुत सुन्दर भाव से पूर्ण कविता ,आज की सच्चाई को निरुपित करती हुई . सफल प्रस्तुति हेतु बधाई .
तरस रहे हैं जो खुद, मय के एक कतरे को, एसे शाकी हमें, आखिर शराब क्या देंगे? श्री मनोज कुमार जी , नमस्कार ! क्या बात है ! आपने आदरणीय डॉ . बाली से...