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मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

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यूँ तो मयखाने से

January 31, 2016

यूँ तो मयखाने  से, हम दूर बहुत रहते हैं।

तेरे नशे में मगर, चूर बहुत रहते हैं।

 

हम तो फौलाद को भी, मोम बना सकते हैं,

इश्क की राह में, मजबूर बहुत रहते हैं।

 

उनपे जब आयी जवानी, वो खुदा भूल गए,

दौलते-हुस्न में, मगरूर बहुत रहते हैं।

 

हम हकीकत में भी जिंदा हैं, जमाने भर में,

हम फसानों में भी, मशहूर बहुत रहते हैं।

 

आप कहते हैं लगातार, गरीबी कम है,

देखो फुटपाथ पे, मजदूर बहुत रहते हैं। 

 

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