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मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

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जताते नहीं हैं लोग ......

दिल में है किसके क्या? ये जताते नहीं हैं लोग !
होंठों  पे दिल की बात भी,  लाते नहीं हैं लोग !

खुद कुछ ना करें, सबकुछ भगवान से चाहें,
सिर सामने यूं ही तो, झुकाते नहीं हैं लोग !!

पलभर में कष्ट दूर हो, मेहनत ना करनी हो,
बाबा को दान यूं ही,  चढ़ाते नहीं हैं लोग !!

अब दान-धर्म केवल, अवतार को, बाबा को ,
भूखे को तो पानी भी, पिलाते नहीं हैं लोग!!

सुनते नहीं हैं बात जो,  लालच में,  स्वार्थ में,
कहते हैं फिर वो, सच को, बताते नहीं हैं लोग !!

मेहनत, ईमानदारी से, दुशवार  है  जीना,
अब भ्रष्ट, बेईमां को, सताते नहीं हैं लोग !

दर्पण की झाड़–पोंछ में,  बीते तमाम उम्र,
चेहरे की अपने धूल, हटाते नहीं हैं  लोग !

लगते  गले  हैं,  हाथ  मिलाते  तपाक  से,
पर भूलकर भी दिल को, मिलाते नहीं हैं लोग !!

देते हैं दिल  को दर्द,  हाल ‘उनका’ पूँछकर,
उस पर भी कहते‘जानी’, सताते नहीं हैं लोग

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Comment

आपकी राय

आजकल के हालात पर करारा तमाचा काश सारी जनता समझ सके

बहुत बढ़िया।

क्या किया जाए सर।।
UPSC आप बिना अंग्रेजी पास नही कर सकते, कोर्ट HC and SC की सरकारी भाषा अंग्रेजी है, ट्रैन के ac में बैठकर आप अंग्रेजी न बोलो तो लोग जाहिल समझते है और उससे भी बड़ी बात यदि किसी पर हिंदी में गुस्सा उतार दिए तो गाली देगा अंग्रेजी में उतार दिए तो चुपचाप सुन लेगा , डर जाएगा।।
ऐसी स्थिति में हिंदी का राष्ट्रव्यापी होना मुश्किल है, पर राजभाषा है तो वार्षिक ही सही जश्न मनाना बनता है।।
हिंदी के प्रोत्साहन कार्यक्रम पर आप इनाम की रकम और मिठाई का डब्बा हटा कर देखिये कैसे भाग लेने वाले अधिकारियों कर्मचारियों में कमी आएगी।।
फिर भी मुबारक आपने इस ओर ध्यान दिया।।

चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात वाली कहावत हिंदी पखवाणा के लिए चरितार्थ हो रही है नाम मातृभाषा है उसके प्रचार प्रसार के लिए इतना कुछ करना पडता है । अफसोस??

महान व्यंग्य महान सेवक की पहचान बताने के लिए

बहुत ही बेहतरीन समकालीन व्यंग्य आदरणीय

लाजवाब मनोजजी

Manoj Jani bolta bahi jo he sahi soach ka badsah jani

वाह! साहेब जी, खूबसूरत ग़ज़ल बनाये हैं।

Behtreen andaj!!Ershad!!!

वहुत अच्छी लगी

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आईने के सामने (काव्य संग्रह) का विमोचन 2014

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चिकोटी (ब्यंग्य संग्रह) का विमोचन 2012

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आदरणीय  कुशवाहा जी प्रणाम। कमेन्ट के लिए धन्यवाद ।
मनोज जी, अत्यंत सुंदर व्यंग्य रचना। शायद सत्ताधारियों के लिए भी जनता अब केवल हंसी-मजाक विषय रह गई है. जब चाहो उसका मजाक उड़ाओ और उसी के नाम पर खाओ&...
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तरस रहे हैं जो खुद, मय के एक कतरे को, एसे शाकी हमें, आखिर शराब क्या देंगे? श्री मनोज कुमार जी , नमस्कार ! क्या बात है ! आपने आदरणीय डॉ . बाली से...