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मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

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किसानों पे सियासत

May 12, 2015

लाचार सी , मायूस, नजर देख रही है।
मिलती जिधर मदद है,उधर देख रही है।

एक दूसरे पे थोप के, इल्जाम पे इल्जाम;
हर मुद्दे से , बचने का, हुनर देख रही है ।

कुदरत को हमने लूटा, खसोटा है हर तरफ;
अन्जाम ये, कुदरत का, कहर देख रही है ।

सौ-दो सौ के , हर्जाने को,पाकरके खुशनसीब;
अरबों के दानियों का, जिगर देख रही है ।

फन्दों पे लटकती ये, किसानों की जिन्दगी;
नेताओँ के वादों का, असर देख रही है ।

जिधर भी देखिये , मरते किसान हैं 'जानी',
मुँह फेरकर सरकार, किधर देख रही है ।

 

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