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मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

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.... फिर भी हम चुप रहते हैं।

लावा दिल में फूट रहा है,

बांध सब्र का टूट रहा है

देश को नेता लूट रहा है

साथ सत्य का छूट रहा है

पर आँख बंद किए रहते है।

... फिर भी हम चुप रहते हैं

 

गर्मी, लू,  बरसात से मरते

रेल और आतंकवाद से मरते

कर्ज, गरीबी, भूंख से  मरते

अन्न  गोदामों मे ही सड़ते

अफसर लूट के जेब को भरते

भूंख, गरीबी सहते हैं

.... फिर भी हम चुप रहते हैं।

 

घोटालो पर घोटाले हो,

जाँच से ही, पर्दा डाले हों

सत्ता मद में मतवाले हों

घोड़े घास के रखवाले हो,

सबकुछ सभी समझते हैं

..... फिर भी हम चुप रहते हैं

 

 

जाति पांति में फंसे हुये

धर्म के नाम पर चुसे हुये

राजनीति से लूटे हुये

महंगाई में पिसे हुये,

सबकुछ तो हम सहते हैं।

...... फिर भी हम चुप रहते हैं...

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आईने के सामने (काव्य संग्रह) का विमोचन 2014

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चिकोटी (ब्यंग्य संग्रह) का विमोचन 2012

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आदरणीय  कुशवाहा जी प्रणाम। कमेन्ट के लिए धन्यवाद ।
मनोज जी, अत्यंत सुंदर व्यंग्य रचना। शायद सत्ताधारियों के लिए भी जनता अब केवल हंसी-मजाक विषय रह गई है. जब चाहो उसका मजाक उड़ाओ और उसी के नाम पर खाओ&...
कुछ न कुछ तो कहना ही पड़ेगा , जानी साहब. कब तक बहरे बन कर बैठे रहेंगे. कब तक अपने जज्बातों को मरते हुए देखेंगे. आखिर कब तक. देश के हालात को व्यक्त क...
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तरस रहे हैं जो खुद, मय के एक कतरे को, एसे शाकी हमें, आखिर शराब क्या देंगे? श्री मनोज कुमार जी , नमस्कार ! क्या बात है ! आपने आदरणीय डॉ . बाली से...