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मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

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हे भारत के बहुजन बोलो..............

भेदभाव, अन्याय, उपेक्षा, कब तक यूं ही सहना है?

हे भारत के बहुजन बोलो, कब तक यूं चुप रहना है?

 

बहुजन को दास बनाने हित, ब्राह्मण ने वेद-पुराण रचा।

खुद को मजबूत बनाने को, मंदिर, देवता, भगवान रचा।

 

बस कर्मकाण्ड में फंसे हुये, केवल ब्राह्मण को रोना है।

स्कूली बस्तों के बदले, कब तक काँवड़ को ढोना है?

 

दौलत जो खून-पसीने की, कबतक मंदिर में चढ़ना है?

हे भारत के बहुजन बोलो, कब तक यूं चुप रहना है?

 

भेज रहे जब यान, विदेशी, ग्रहों का सीना चीर।

हम श्राद्धों में भेज रहे, ब्राहमणों से पूड़ी खीर।

 

ब्राह्मण देवी देवताओं के, हाथ में क्यों हथियार?

आखिर किसको मारेंगे ये?, पूंछे बाबा पेरियार।

 

शूद्र बनाए जो हमको, देवता-पुराण सब जलना है।

हे भारत के बहुजन बोलो, कब तक यूं चुप रहना है?

 

विद्या-हीन बने अज्ञानी, नैतिक बने ना ज्ञान बिना,

नीति बिना उत्थान नहीं, शिक्षा बिना समस्त छिना।

 

चमड़े सिलना मोची का ज्यों, धर्म नहीं है, धन्धा है।

पूजा-पाठ-हवन करवाना, वैसे ब्राह्मण का धन्धा है।

 

गीता-मानस-स्मृति छोड़, फूले-अंबेदकर पढ़ना है।

हे भारत के बहुजन बोलो, कब तक यूं चुप रहना है?

 

ब्रह्मा, विष्णु, या महेश में, रखना है विश्वास नहीं।

राम-कृष्ण अवतारों की, पूजा आस्था या आस नहीं।

 

गौरी-गणपति, देवी-देवता में, न आस्था हो न पूजा।

विष्णु के अवतार बुद्ध थे, ये भी प्रचार केवल झूठा।

 

ना श्राद्ध चढ़े अब पितरों को, ना पिंडदान ही करना है।

हे भारत के बहुजन बोलो, कब तक यूं चुप रहना है?

चोरी, लंपटता, झूठ, छोड़ना, मानवता का साधक है।

हिन्दू धर्म त्यागना है जो, समता-विकास में बाधक है।

 

दया-प्यार जीवों पे करके, समता-समानता लाना है।

मादकता से रहें दूर, और बुद्ध शरण में जाना है।

 

बाबा साहब के बाईस, संकल्पों पर ही चलना है।

हे भारत के बहुजन बोलो, कब तक यूं चुप रहना है?

 

सदियों से चलती आई है, या धर्म शास्त्र में लिखा हुआ।

इसलिए मानना नहीं सिर्फ, की आदरणीय ने कहा हुआ।

 

बातें केवल वो ही मानो, जो तर्क बुद्धि पर खरा लगे।

अंधभक्त मत बनो किसी के, भला लगे या बुरा लगे।

 

राह दिखाई बुद्ध ने जो, उन दस परिमितों पे चलना है।

हे भारत के बहुजन बोलो, कब तक यूं चुप रहना है?

 

तोता रटंत मनुवाद नहीं, असली मनुवाद समझना है।

बहुजन के भीतर भेदभाव, उससे भी पार उतरना है।

 

हिन्दू बनने के चक्कर में, ब्राहमण का सेवादार बना।

‘जानी’ये ब्राहमण धर्म ही तो, शोषण का हथियार बना।

   

शिक्षित हो, संगठित बने, संघर्ष बहुत ही करना है।

हे भारत के बहुजन बोलो, कब तक यूं चुप रहना है?

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Comment

आपकी राय

Very nice Sir, you always highlight important point of the country.

भाई रावण कब तक जलाएंगे लाखों खुले आम घूम रहे हैं उनका क्या होगा और कब होगा??

Wha kya baat hain.

एकदम झन्नाटेदार थप्पड़ की तरह रसीद किया है भाई आपने ये जागरूकता चरस भरा व्यंग्यात्मक लेख। उम्मीद है कि hard-core चरसीयों पर भी भारी पड़े आपका ये जागरूक करने वाला चरस।

आप का व्यंग्य बहुत अच्छा है ,एक चुटकी चरस का असर बहुत है।

Jara saa vyngy roopi charas bhii chakh lenaa chahiye .Dil khush ho jaataa hai.bahut khoob kaha......

सटीक व्यंग्य। फ़िल्म में किसी महा पुरूष या स्त्री का किरदार निभाकर क्या वास्तविक जीवन में भी वैसा होने का दावा कर सकता/सकती है। इसके नकारात्मक पहलू को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता । डायन/ चुड़ैल/ वेश्या / चोर/ डकैत/ बलात्कारी का किरदार निभाने वालों के बारे में केवल कल्पना करें तो...

Bahut khub sir

वास्तविकता यही है। सम्मान की भावना नहीं है कहीं भी।

Waw that's so funny but to the point

Ati uttam sir

उचित कहा, यह हमारी विडंबना है कि हमें हिन्दी पखवाड़ा मनाना पड़ता है |

बहुत सुंदर प्रस्तुति। वास्तव में ये बड़ी विपरीत धारणा हमारे देश मे है कि हिन्दी भाषी लोग पिछड़े होते है शायद इसी कारण अंग्रेजी में बात करना लोग अपनी शान और अग्रिम पंक्ति में बने रहना मानते है। आपको बहुत बधाई। आगे भी आपकी व्यग्य यात्रा और विकसित स्तर पर पहुचे। शुभकामनाये

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आईने के सामने (काव्य संग्रह) का विमोचन 2014

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अन्यत्र

आदरणीय  कुशवाहा जी प्रणाम। कमेन्ट के लिए धन्यवाद ।
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कुछ न कुछ तो कहना ही पड़ेगा , जानी साहब. कब तक बहरे बन कर बैठे रहेंगे. कब तक अपने जज्बातों को मरते हुए देखेंगे. आखिर कब तक. देश के हालात को व्यक्त क...
स्नेही जानी जी , सादर ,बहुत सुन्दर भाव से पूर्ण कविता ,आज की सच्चाई को निरुपित करती हुई . सफल प्रस्तुति हेतु बधाई .
तरस रहे हैं जो खुद, मय के एक कतरे को, एसे शाकी हमें, आखिर शराब क्या देंगे? श्री मनोज कुमार जी , नमस्कार ! क्या बात है ! आपने आदरणीय डॉ . बाली से...