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मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

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धर्म बनाम जाति..............

वतन हिन्द था बहुत सुहावन।  बहत जहा गंगा जल पावन ॥

जाति  धर्म की  चर्चा  नाहीं।  ईर्ष्या, द्वेष ना भारत माहीं ॥

मिलि जुलि रहई इंहा सब लोगा। करई सदा कारज सम भोगा॥

कछुक दशक भई हिन्द आजादी।खतम मनुजता भई बुनियादी ॥

दुरुपयोग   भइली आजादी।  मिट गये भगत, बॉस अरू गांधी ॥

लोग रखाए  देश  को ऐसा।  घास  रखावत घोडा    जैसा ॥

जब घर अग्नि चिराग लगाए।  तो फिर घर को कौन बचाए ॥

ऐसे  हुआ  देश  के संगा । नेता  लोग   बढ़ाए   दंगा  ॥

रहें  देश में, देश को खाये। दीमक ज्यों लकड़ी को चबाए ॥

 

आजादी के मिलन से, मिल गयी इतनी छूट ।

जातिवाद, हिंसा, बढ़ी,  और बढ़  गयी फुट ॥

 

नेता   लोग  लड़ावन  लागे।  वोट  बैंक  बनावन   लागे ॥

जेहि विधि बनई देश के राजा। नेता करई तुरत सोई काजा ॥

धर्म –जाति सब एक समाना । लेकिन बांटी देई  भगवाना ॥

खुद तो देश एक में जोरे ।     राम  रहीम  मेँ  नाता तोरें ॥

बहुसंख्यक जो धर्म  है देशा । तिन्हई पूजि ये बनई नरेशा॥

मातृ - गर्भ  में जैसे   बेटा । भारत देश में  वैसे   नेता॥

माँ शोषण  से करता  पोषण । देश  सोख वो करते पोषण ॥

हिन्दू संख्या ज्यादा देखी ।  इनके हिय तब सोच विसेखी॥

हिन्दू हित कछु ढोंग दिखावऊ। काहे न मस्जिद ही गिरवावऊ॥

 

स्वार्थ भरी तलवार से, कटा खुदा का शीश।

सारे जग के बीच में, झुका देश का शीश ॥

 

रहत सदा हम जिसकी दुनिया।    उससे बड़ा कौन हे गुनिया ॥

बन्द   किए  भगवान को ऐसे ।  तोता हो पिंजरे में  जैसे ॥

राम बन्द  मंदिर  के  अन्दर । भइल तलैया में ही समुंदर ॥

धर्म  अस्त्र  जब  प्रथमू  डाले । दूजे जन ब्रह्मास्त्र  निकाले ॥

धर्म अस्त्र  से  अच्छे  लक्षण । नाम  दिये उसको आरक्षण ॥

वर्ण  अस्त्र  भी  रंग दिखाया । दूजे को शासन   दिलवाया ॥

मल्लयुद्ध फिर हुआ अरम्भा । भइल  देश  में ज़ोर का दंगा ॥

वाक- युद्ध   की  शुरू लड़ाई । एक दूजे की  किए  बुराई ॥

बोला  प्रथम  भूप सह रोषा । दूजे वाले  का  सब  दोषा ॥

इसने  जातिवाद   फैलाया । जनता संग दो भाव दिखाया ॥

 

दिया छूट बस एक को, दूजा हुआ भिंखार ।

देश तोड़ने का है,  इसका  बुरा   विचार ॥

 

दूजे भी तो थे अति ज्ञानी । सुनत वचन बोले मृदु बानी ॥

“माना मेंने जाति बढ़ाया । तुमने   पहले   धर्म बढ़ाया ॥

गर मैने दो भाव दिखाया । तुमने ही कब एक दिखाया ॥

हिन्दू  धर्म  बढ़ाया  तूने । मुस्लिम धर्म  दबाया तूने ॥

तुमने सिर्फ बढ़ाया हिन्दू । तुमसे ही  कुछ सीखा बंधु ॥

तुमने भी तो एक उठाया । मैने भी वो  ही अपनाया ॥

संविधान की बात जहाँ हो। तुमसे पहले प्रश्न वहाँ हो ॥

सविधान तूने क्यों छोड़ा। मस्जिद को तुमने क्यों तोड़ा ॥

ये तो समय बात में काटें ।अपने हित भाई को बांटे ॥

संभल नहीं गर हम जायेंगे। तो फिर आगे पछतायेंगे ॥

 

इसी  बीच में  तीसरे,  नेता  उभरे   एक ।

मुस्लिम धर्म बढ़ाने का, किया फैसला नेक ॥

 

बढ़ा वोट जब तीजे जन का । तब  दोनों का माथा ठनका ॥

सोचे   दोनों  फिर   से थोड़ा । दौड़ाए दिमाग का  घोड़ा ॥

एसे  गर  हम   लड़ जाएंगे । तीजे  कुर्सी  पा   जाएंगे ॥

फिर  दोनों की बंद लड़ाई । बन  गए दोनों भाई –भाई ॥

मिलकर दोनों  कुर्सी पाए । तीजे  जन  को दूर भगाए ॥

स्वारथ कुर्सी का हे इनको ।  खद्दर पहन के लूटे दिन को ॥

देश भलाई तनिक न जाँचे । खद्दर  पहन के  नंगा नाचे ॥

अपने हित भगवान को बांटे। स्वयं  बढ़ाकर खाईं,  पाटें ॥

कुर्सी हित कुछ भी कर जायें । दुश्मन और दोस्त बन जायें ॥

संभल नहीं गर हम जाएँगे । तो  फिर  आगे  पछतायेंगे ॥

 

नेता-गण सब शूल हैं,  तो  हैं लोग सरोज ।

सोच-समझ जनता बढे, विनती करे ‘मनोज’॥

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Comment

आपकी राय

आजकल के हालात पर करारा तमाचा काश सारी जनता समझ सके

बहुत बढ़िया।

क्या किया जाए सर।।
UPSC आप बिना अंग्रेजी पास नही कर सकते, कोर्ट HC and SC की सरकारी भाषा अंग्रेजी है, ट्रैन के ac में बैठकर आप अंग्रेजी न बोलो तो लोग जाहिल समझते है और उससे भी बड़ी बात यदि किसी पर हिंदी में गुस्सा उतार दिए तो गाली देगा अंग्रेजी में उतार दिए तो चुपचाप सुन लेगा , डर जाएगा।।
ऐसी स्थिति में हिंदी का राष्ट्रव्यापी होना मुश्किल है, पर राजभाषा है तो वार्षिक ही सही जश्न मनाना बनता है।।
हिंदी के प्रोत्साहन कार्यक्रम पर आप इनाम की रकम और मिठाई का डब्बा हटा कर देखिये कैसे भाग लेने वाले अधिकारियों कर्मचारियों में कमी आएगी।।
फिर भी मुबारक आपने इस ओर ध्यान दिया।।

चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात वाली कहावत हिंदी पखवाणा के लिए चरितार्थ हो रही है नाम मातृभाषा है उसके प्रचार प्रसार के लिए इतना कुछ करना पडता है । अफसोस??

महान व्यंग्य महान सेवक की पहचान बताने के लिए

बहुत ही बेहतरीन समकालीन व्यंग्य आदरणीय

लाजवाब मनोजजी

Manoj Jani bolta bahi jo he sahi soach ka badsah jani

वाह! साहेब जी, खूबसूरत ग़ज़ल बनाये हैं।

Behtreen andaj!!Ershad!!!

वहुत अच्छी लगी

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आईने के सामने (काव्य संग्रह) का विमोचन 2014

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चिकोटी (ब्यंग्य संग्रह) का विमोचन 2012

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आदरणीय  कुशवाहा जी प्रणाम। कमेन्ट के लिए धन्यवाद ।
मनोज जी, अत्यंत सुंदर व्यंग्य रचना। शायद सत्ताधारियों के लिए भी जनता अब केवल हंसी-मजाक विषय रह गई है. जब चाहो उसका मजाक उड़ाओ और उसी के नाम पर खाओ&...
कुछ न कुछ तो कहना ही पड़ेगा , जानी साहब. कब तक बहरे बन कर बैठे रहेंगे. कब तक अपने जज्बातों को मरते हुए देखेंगे. आखिर कब तक. देश के हालात को व्यक्त क...
स्नेही जानी जी , सादर ,बहुत सुन्दर भाव से पूर्ण कविता ,आज की सच्चाई को निरुपित करती हुई . सफल प्रस्तुति हेतु बधाई .
तरस रहे हैं जो खुद, मय के एक कतरे को, एसे शाकी हमें, आखिर शराब क्या देंगे? श्री मनोज कुमार जी , नमस्कार ! क्या बात है ! आपने आदरणीय डॉ . बाली से...