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मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

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जनसंख्या वृद्धि

नहीं खाद पानी, न उपजाऊ मिट्टी

पौधे- पे- पौधे,  लगा क्यूँ  रहे हो?

न आंधी पे काबू, न बरखा पे काबू

सरस को कंटीला, बना क्यूं रहे हो?

 

              अगर पेड़ कम हो, तो बनता है उपवन

              अधिक हो अगर तो, वो बन जाए जंगल

              उपवन  में मिलता, सदा   खाद -पानी

              मगर जंगलों में, तो  होती  है दंगल

 

ये सच है तुम्हारी, करेंगे ए सेवा

बिना खाद–पानी, नहीं देंगे मेवा

सुखी चाहते हो, अगर अपना जीवन

जंगल नहीं बस, लगाना  तू उपवन

 

              मिले खाद पानी, तो खिलता है फूल

              बिना सेवा के ही, वो बनता है शूल

              सुमन को भी कांटे, बना क्यूं रहे हो

              पौधे –पे –पौधे, लगा क्यूं रहे हो ? 

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veryyyyyyyyyyyyyyyyy good



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आईने के सामने (काव्य संग्रह) का विमोचन 2014

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चिकोटी (ब्यंग्य संग्रह) का विमोचन 2012

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तरस रहे हैं जो खुद, मय के एक कतरे को, एसे शाकी हमें, आखिर शराब क्या देंगे? श्री मनोज कुमार जी , नमस्कार ! क्या बात है ! आपने आदरणीय डॉ . बाली से...