हम भी लूटें, तुम भी लूटो, लूटने की आजादी है।
सबसे ज्यादा वो लूटेगा, जिसके तन पर खादी है।
मंदिर-मस्जिद में उलझाओ, आरक्षण के वादे दो,
याद ना कर पाये जनता, मुद्दा जो बुनियादी है।
सबसे ज्यादा वो लूटेगा....
मिल जाते हैं कट्टर दुश्मन, करने को जनता पर राज
दलित मसीहा उनसे मिलते, जिनको कहते मनुवादी हैं
सबसे ज्यादा वो लूटेगा .......
चुनकर भेजा जिसको हमने, जनता की सेवा में,
सेवक वो मालिक बन बैठा, जनता अब फरियादी है
सबसे ज्यादा वो लूटेगा....
डरो ना उनसे, जी भर लूटो, चाहे अत्याचार करो
उफ़ ना करेगी जनता ‘जानी’, वो इन सबकी आदी है
सबसे ज्यादा वो लूटेगा .....






































आप की राय
Kya kahen sahab....Aapki is rachna ke har shabd bahut kuchh kah rahe hain. Ab to bas zarurat hai ki hum log isko samjhe aur apne aachran, apni soch me sudhar layen.
Bahut sundar rachna hai aur iske liye aapko bahut bahut badhai.
Aapki rachnaon me bahut gahrai hoti hai jo logon ko jhajhor kar rakh deti hain.
mind blowing , thought provoking soul stirring rachna
आदरणीय मनोज जी,
सादर !
बहुत खूबसूरत रचना ! बेहतरीन !
एक-एक पंक्ति सार्थक !
बधाई !
आपने इअतना कुछ कह दिया.....
अब हम सोच रहे हैं कि अब हम क्या कहे साहब....................!
मनोज जी ,हम अपने देश के हालात क्या कहें साहब .
धरातल में जा रहा देश ,क्या करे साहब ,बढिया प्रस्तुति ,बधाई
आज भी योग्यता को, जातियों से हम मापें,
सबकी पहचान बनी जात! क्या कहें साहब !!
सुनाऊँ चीख किसे, ‘जानी’ सभी बहरों में,
ना करें देश की हम बात! चुप रहें साहब !!
हम अपने देश के हालात ! क्या कहें साहब !!
दिल में जलते हुये जज़्बात! क्या कहें साहब !!
श्री मनोज जोहनी जी , सादर ! ये वाली आपकी ग़ज़ल मैंने आपकी वेबसाइट पर पहली भी पढ़ी है ! क्या खूब लिखते हैं आप ! डॉ. बाली ने बताया था आपके विषय में और अगर ज्यादा गलत नहीं हूँ तो आपमें भी वाही गुण हैं जो आदरणीय डॉ. बाली में हैं ! बहुत खूब ग़ज़ल ! एक एक अश'आर , सुन्दर !
आपकी इस रचना के बारे में, अब क्या कहे शाहीब
मनोज जी आपकी रचना ने ये सोचने को विवश किया है की अपनी जिस संस्कृति का गुणगान हम करते हैं वो किस निम्न स्तर पर पहुँच रही है.
बच्चियाँ गर्भ में ही मार कर, नौरात्रि मनाएँ,
चढ़ती दहेज से बारात ! क्या कहें साहब !!
कविता के माध्यम से अच्छे प्रश्न मंच पर रखे है......
कुछ न कुछ तो कहना ही पड़ेगा , जानी साहब. कब तक बहरे बन कर बैठे रहेंगे. कब तक अपने जज्बातों को मरते हुए देखेंगे. आखिर कब तक.
देश के हालात को व्यक्त करती हुयी सुन्दर प्रस्तुति.
बधाई.
मनोज जी देश के हालात की बहुत ही सटीक प्रस्तुति की है आपने।
ये हालात बदलना होंगे , हम सबको सामूहिक प्रयास करके।
सराहनीय रचना के लिये बधाई.....
मनोज जी ,
ना कह पाने का भाव लेकर भी ,
आपने मित्र सब कुछ कह दिया
सुन्दर रचना
No words to appreciate your feelings
क्या बात है दोस्त, जरा सी बात मे भी गागर मे सागर भर जाते है लोग (जॉनी)
प्रिय मनोज सर,
कुछ सोचना और सोच कर लिख पाना बड़ी बात होती है, आपकी रचनाओं को पढ़कर मन को खुशी मिलती है।
इस परम्परा को जारी रखिये,,,