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मनोज जानी

बोलो वही, जो हो सही ! दिल की बात, ना रहे अनकही !!

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कविताओं की सूची

कविता

करेक्टर वाली गाय.......

December 29, 2017

.......

गरीबी से परेशान,

था एक किसान।

न पैसे, न बेंचने को,

था कोई सामान।

दो गायें थी उसकी,

कुल जमा पूंजी।

इनके सिवा संपत्ति,…

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दर्द होता रहा, छटपटाटे रहे.....

August 18, 2017

दर्द होता रहा, छटपटाटे रहे, 
भ्रष्ट सिस्टम से हम, चोट खाते रहे.

फूल जन्माष्टमी पर, चढ़ाये बहुत, 
फूल गुलशन के बस, मुरझाते रहे.…

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वो चिंता पे चिंता, किये जा रहे हैं।

July 16, 2016

वो चिंता पे चिंता, किये जा रहे हैं।
हम उनके भरोसे, जिये जा रहे हैं।

 

महंगाई पे चिंता, बेगारी पे चिंता,
वो चिंता बराबर, किये जा रहे हैं।…

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बढ़िया है...

November 17, 2015

बढ़िया है...बढ़िया है...
तेरे नेता देश लूटते, देश भक्त बस मेरे नेता,
सबके अपने चश्मे हैं, सबका अलग नजरिया है। 
बढ़िया है...

 

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वीर सपूत

October 28, 2015

होली, ईद, दिवाली बस, मनती है जज़्बातों में

हम चैन की नींद तभी सोते हैं, जब जागते हैं वो रातों में।

 

ठंडी, गर्मी या बारिश हो, जो लड़ते हर हालातों …

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यह कैसा है लोकतन्त्र ?

August 12, 2014

यह कैसा है लोकतन्त्र?

कैसा यह जनता का राज

सहमी-सहमी जनता सारी

कैसा है ये देश आजाद ?

          जनमों के दुश्मन कुर्सी हित…

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बारी -बारी देश को लूटें ..........

April 25, 2014

बारी -बारी  देश  को  लूटें, बनी रहे  अपनी  जोड़ी।

तू हमरे जीजा के छोड़ा, हम तोहरे जीजा के छोड़ी।

 

एक सांपनाथ एक नागनाथ, एक अम्बेदकर लोहियावादी,…

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हिन्दी पखवाड़ा .......

September 9, 2013

हिन्दुस्तान में हिन्दी का, आज हो रहा  यह  सम्मान

हिन्दी पखवाडे के अलावा, हिन्दी कभी ना आये ध्यान

 

भाषण में हम कहते, ‘हिन्दी, बहुत सुबोध, सरल है…

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किसे चाहिए वैरागी ? हर दल मांगे, केवल दागी

August 3, 2013

किसे चाहिए वैरागी ? हर दल मांगे, केवल दागी। 
जिसके पास है पैसा-पावर, जनता उसके पीछे भागी।

जाति-धर्म-धन जनता देखे, और नहीं कुछ जाँचें, …

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बटला काण्ड पर रोईं सोनिया

July 25, 2013

       बटला पे रोई सोनिया, ये एहसान बहुत है।

      शायद चुनाव क्षेत्र में, मुसलमान बहुत हैं।

 

              बरसों पुराने जख्म, चुनावों में कुरेदो…

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आईने के सामने (काव्य संग्रह) का विमोचन 2014

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चिकोटी (ब्यंग्य संग्रह) का विमोचन 2012

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अन्यत्र

आदरणीय  कुशवाहा जी प्रणाम। कमेन्ट के लिए धन्यवाद ।
मनोज जी, अत्यंत सुंदर व्यंग्य रचना। शायद सत्ताधारियों के लिए भी जनता अब केवल हंसी-मजाक विषय रह गई है. जब चाहो उसका मजाक उड़ाओ और उसी के नाम पर खाओ&...
कुछ न कुछ तो कहना ही पड़ेगा , जानी साहब. कब तक बहरे बन कर बैठे रहेंगे. कब तक अपने जज्बातों को मरते हुए देखेंगे. आखिर कब तक. देश के हालात को व्यक्त क...
स्नेही जानी जी , सादर ,बहुत सुन्दर भाव से पूर्ण कविता ,आज की सच्चाई को निरुपित करती हुई . सफल प्रस्तुति हेतु बधाई .
तरस रहे हैं जो खुद, मय के एक कतरे को, एसे शाकी हमें, आखिर शराब क्या देंगे? श्री मनोज कुमार जी , नमस्कार ! क्या बात है ! आपने आदरणीय डॉ . बाली से...